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सरकार या मुख्यमंत्री की आलोचना पर पत्रकार पर आपराधिक कार्रवाई नहीं हो सकती: SC

सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए साफ कहा है कि सरकार या मुख्यमंत्री की आलोचना मात्र से किसी पत्रकार के खिलाफ आपराधिक मामला नहीं बनता. यह टिप्पणी वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक उपाध्याय की याचिका पर सुनवाई करते हुए दी गई, जिन पर उत्तर प्रदेश सरकार की जाति आधारित नियुक्तियों की आलोचना करने पर एफआईआर दर्ज की गई थी. जस्टिस हृषिकेश रॉय और एस.वी.एन. भट्टी की पीठ ने उत्तर प्रदेश पुलिस से चार सप्ताह में जवाब मांगा है और तब तक उपाध्याय की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है. कोर्ट ने कहा कि आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, न कि कोई आपराधिक कृत्य. यह फैसला प्रेस की आज़ादी के लिए एक मजबूत संदेश है.

अभिषेक उपाध्याय ने कोर्ट में बताया कि सरकार उन्हें डराने के लिए लगातार मुकदमे कर रही है और एसटीएफ तक को उनके पीछे लगाया गया. सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि पत्रकार के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने से पहले पुलिस को जांच करनी होगी कि क्या आरोपों का कोई वैधानिक आधार है. सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से उन पत्रकारों को राहत मिली है, जो सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हैं. कोर्ट ने दो टूक कहा— “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा है, न कि राजद्रोह.” अगली सुनवाई नवंबर 2024 में होगी.