सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक स्वतंत्रता और महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान हिंदू धर्म को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। बुधवार (13 मई) को सुनवाई के दौरान नौ जजों की संविधान पीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति के हिंदू बने रहने के लिए मंदिर जाना या किसी विशेष धार्मिक अनुष्ठान का पालन करना अनिवार्य नहीं है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि घर में दीपक जलाना भी आस्था और विश्वास का प्रतीक माना जा सकता है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली इस पीठ ने कहा कि हिंदू धर्म केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने का एक व्यापक तरीका है। पीठ में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, एम.एम. सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी वराले, आर. महादेवन और जॉयमल्या बागची शामिल हैं।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. जी मोहन गोपाल ने 1966 के एक पुराने फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय हिंदू धर्म की परिभाषा वेदों को सर्वोच्च मानने वाले व्यक्ति के रूप में की गई थी। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या वर्तमान समाज में हर व्यक्ति उसी परिभाषा पर खरा उतरता है।
इस पर जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की कि इसी कारण हिंदू धर्म को जीवन शैली कहा जाता है, जहां हर व्यक्ति अपनी आस्था को अपने तरीके से व्यक्त कर सकता है। किसी को भी उसकी धार्मिक भावना से वंचित नहीं किया जा सकता। मुख्य न्यायाधीश ने भी कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपनी झोपड़ी में दीपक जलाकर भी श्रद्धा व्यक्त करता है, तो वह उसकी धार्मिक आस्था का प्रमाण है। यह पीठ सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश, धार्मिक स्वतंत्रता और परंपराओं से जुड़े मुद्दों पर व्यापक सुनवाई कर रही है।









