हिमाचल प्रदेश का फार्मा उद्योग इस वक्त गंभीर चुनौतियों से गुजर रहा है। राज्य की प्रमुख संस्था हिमाचल ड्रग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (HDMA) ने चेताया है कि यदि सरकार ने समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया, तो बड़े पैमाने पर रोजगार पर संकट खड़ा हो सकता है। उद्योग जगत का कहना है कि महामारी के दौरान फार्मा यूनिट्स ने प्रदेश और देश के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया था, लेकिन अब वही उद्योग सख्त नियमों और प्रशासनिक दबाव से जूझ रहा है।
HDMA का आरोप है कि विभाग उद्योगों को सहयोग देने की बजाय सीधे कार्रवाई की राह पर बढ़ रहे हैं। कई कंपनियों को महज़ 14 दिनों का नोटिस देकर बंद करने के निर्देश जारी किए गए हैं। सबसे अधिक परेशानी उन यूनिट्स को हो रही है, जिन्होंने अब तक रिवाइज्ड शेड्यूल M के तहत आवेदन नहीं किया है। विभाग ऐसे उद्योगों की सूची बनाकर नोटिस भेज रहा है, जबकि कारोबारियों का कहना है कि नए मानकों को लागू करने के लिए समय और तकनीकी मार्गदर्शन दोनों जरूरी है।
अब तक केवल लगभग 120 कंपनियां ही संशोधित नियमों के अनुसार कंसेंट जमा कर पाई हैं। बाकी यूनिट्स तैयारी में लगी हैं, लेकिन लगातार बढ़ते दबाव को लेकर चिंतित हैं। उद्योगपतियों का कहना है कि “फैक्ट्री राज” जैसा माहौल न बनाया जाए। अगर हालात ऐसे ही रहे, तो हजारों लोगों की आजीविका खतरे में पड़ सकती है। अभी तक करीब 30 उद्योग बंद हो चुके हैं या बंद होने की स्थिति में हैं। नई दूरी संबंधी शर्तें (500 से 1500 मीटर) और अन्य प्रावधानों के कारण बैंक भी फार्मा सेक्टर को ऋण देने में हिचक रहे हैं।
HDMA के प्रवक्ता संजय शर्मा ने सरकार से एक विशेष औद्योगिक ज़ोन विकसित करने का अनुरोध किया, जहां नई नीतियों को लागू करना आसान हो और उद्योगों को वित्तीय सहायता मिल सके। वहीं नालागढ़ के उद्योगपति आशुतोष अस्थाना ने बताया कि रिवाइज्ड शेड्यूल M की लागत उनके लिए असंभव थी, जिसके चलते उनकी ‘भानु हेल्थ केयर’ यूनिट बंद करनी पड़ी। इससे 100 से अधिक कर्मचारी बेरोजगार हो गए। उद्योग जगत ने सरकार से इस “गंभीर संकट” को दूर करने के लिए तुरंत कदम उठाने की मांग की है।








