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किशाऊ परियोजना पर पंजाब की आपत्ति, सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी

किशाऊ बहुउद्देश्यीय परियोजना को लेकर पंजाब और केंद्र के बीच विवाद गहराता नजर आ रहा है। पंजाब सरकार अब इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाने की तैयारी कर रही है। आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ प्रवक्ता नील गर्ग ने कहा है कि पंजाब अपने जल अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी लड़ाई लड़ेगा। उनका कहना है कि यमुना के पानी में पंजाब के अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।

गर्ग के मुताबिक, 15 सितंबर को नई दिल्ली में किशाऊ परियोजना को लेकर छह राज्यों के बीच समझौता हुआ, जिसमें पंजाब को शामिल नहीं किया गया। इस समझौते पर उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के मुख्यमंत्रियों ने हस्ताक्षर किए। बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल भी मौजूद रहे।

पंजाब सरकार का तर्क है कि उसके हितों को प्रभावित करने वाला कोई भी फैसला उसकी सहमति और भागीदारी के बिना नहीं किया जाना चाहिए। गर्ग ने 1954 में पंजाब के यमुना जल संबंधी अधिकारों का हवाला देते हुए कहा कि पंजाब पुनर्गठन के बाद भी इन अधिकारों को समाप्त नहीं माना जा सकता। उनका कहना है कि पंजाब को प्रक्रिया से बाहर रखना कानूनी विवाद को जन्म दे सकता है।

किशाऊ परियोजना हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा पर टोंस नदी पर प्रस्तावित है। इसमें 1,562 एमसीएम जल भंडारण की क्षमता होगी। समझौते के तहत हरियाणा को 633 एमसीएम, उत्तर प्रदेश को 411 एमसीएम, राजस्थान को 124 एमसीएम और दिल्ली को 80 एमसीएम पानी मिलने का प्रावधान है। परियोजना की बिजली उत्पादन क्षमता 422 मेगावाट होगी और इससे सालाना करीब 1,476 मिलियन यूनिट बिजली उत्पादन का अनुमान है। लगभग 97 हजार हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचाई सुविधा देने का लक्ष्य है। केंद्र सरकार ने इसे राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा दिया है और लागत का करीब 90 फीसदी हिस्सा केंद्र उठाएगा।