दुनिया तेजी से डिजिटल लेनदेन की ओर बढ़ रही है, लेकिन नकदी का महत्व आज भी बरकरार है। भारत में करोड़ों लोग रोजमर्रा के भुगतान के लिए नोटों का इस्तेमाल करते हैं। इसी बीच पॉलिमर करेंसी, जिसे आमतौर पर प्लास्टिक नोट कहा जाता है, एक बार फिर चर्चा में है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) समय-समय पर इस तकनीक पर विचार करता रहा है और भविष्य में इसके इस्तेमाल की संभावनाएं जताई जा रही हैं।
पॉलिमर नोट विशेष प्रकार के प्लास्टिक पदार्थ ‘बाय-एक्सियली ओरिएंटेड पॉलीप्रोपाइलीन’ (BOPP) से बनाए जाते हैं। ये नोट सामान्य कागजी नोटों की तुलना में अधिक मजबूत, टिकाऊ और सुरक्षित माने जाते हैं। इनमें पारदर्शी विंडो, माइक्रोटेक्स्ट और अन्य उन्नत सुरक्षा फीचर शामिल किए जा सकते हैं, जिससे नकली नोट तैयार करना बेहद कठिन हो जाता है।
दुनिया में सबसे पहले ऑस्ट्रेलिया ने वर्ष 1988 में पॉलिमर नोट जारी किए थे। इसके बाद कनाडा, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड, सिंगापुर, मलेशिया और यूएई समेत 60 से अधिक देशों ने इस तकनीक को अपनाया। कई देशों में पूरी तरह पॉलिमर करेंसी चल रही है, जबकि कुछ स्थानों पर कागजी और पॉलिमर दोनों प्रकार के नोट प्रचलन में हैं।
भारत में भी पहले पॉलिमर नोटों के परीक्षण की योजना बनाई गई थी, लेकिन यह आगे नहीं बढ़ सकी। अब फिर से छोटे मूल्य वर्ग के नोटों में इस तकनीक के उपयोग पर चर्चा हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे नोटों की उम्र बढ़ेगी, प्रिंटिंग लागत कम होगी और नकली नोटों की समस्या पर भी नियंत्रण पाया जा सकेगा।
हालांकि, इसकी शुरुआत के लिए बड़े निवेश, नई तकनीक और एटीएम समेत कई मशीनों में बदलाव की आवश्यकता होगी। इसके बावजूद भविष्य में भारत की मुद्रा व्यवस्था को अधिक सुरक्षित और आधुनिक बनाने में पॉलिमर करेंसी अहम भूमिका निभा सकती है।









