अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की कई धाराओं की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी। याचिका में कानून की धारा 3(1), 3(2)(i), 3(2)(v), 4, 8, 18, 18-A और 19 को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि इन प्रावधानों के कुछ हिस्से संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 22 में मिले मौलिक अधिकारों को प्रभावित करते हैं।
अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन के माध्यम से बृजभूषण सैनी समेत 19 याचिकाकर्ताओं ने यह याचिका दाखिल की है। इसमें पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज करने और गिरफ्तारी की प्रक्रिया को लेकर स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करने की मांग भी की गई है। याचिका में सबसे प्रमुख चुनौती धारा 18-A को लेकर है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इसके तहत एफआईआर दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच और गिरफ्तारी से पहले अनुमति की आवश्यकता नहीं होती। उनका कहना है कि इससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित होने की आशंका रहती है। याचिका में 2018 के उस संशोधन पर भी सवाल उठाया गया है, जिसके जरिए धारा 18-A को कानून में शामिल किया गया था।
इसके अलावा धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत पर प्रतिबंध, धारा 8 में कुछ परिस्थितियों में आरोपी के खिलाफ अनुमान संबंधी प्रावधान और धारा 19 में परिवीक्षा से जुड़ी सीमाओं को भी चुनौती दी गई है। धारा 3(2)(i) और 3(2)(v) के तहत सजा से जुड़े प्रावधानों पर भी अनुच्छेद 21 में निहित आनुपातिकता के सिद्धांत के आधार पर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं ने अंतरिम राहत की मांग करते हुए धारा 8, 18, 18-A और 19 के संचालन पर रोक लगाने की मांग की है। मामले में केंद्र सरकार, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय तथा राष्ट्रीय SC और ST आयोगों को पक्षकार बनाया गया है।


