महाराष्ट्र में ऑटो-रिक्शा, टैक्सी और ऐप आधारित कैब चालकों के लिए मराठी भाषा का बोलचाल का ज्ञान अनिवार्य करने के राज्य सरकार के फैसले को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। इस फैसले के खिलाफ चार नागरिक अधिकार संगठनों और कुछ व्यक्तियों ने मंगलवार, 25 अगस्त को जनहित याचिका (PIL) दायर की।
याचिका में महाराष्ट्र सरकार के गृह (परिवहन) विभाग की 12 अगस्त को जारी अधिसूचना को चुनौती दी गई है। इसके तहत महाराष्ट्र मोटर वाहन नियम, 1989 में संशोधन कर ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने और उसके नवीनीकरण के साथ-साथ परमिट लेने और उसके नवीनीकरण के लिए मराठी भाषा का ज्ञान अनिवार्य किया गया है।
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि इस नियम से महाराष्ट्र के बाहर से आने वाले नागरिकों के साथ भेदभाव हो सकता है। उनका कहना है कि यह संविधान के अनुच्छेद 19(1)(d) और 19(1)(e) के तहत देश में स्वतंत्र रूप से आने-जाने और किसी भी हिस्से में रहने-बसने के अधिकार के साथ-साथ एकल नागरिकता के सिद्धांत के विपरीत है।
याचिकाकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि उन्हें मराठी भाषा के प्रचार-प्रसार से कोई आपत्ति नहीं है। हालांकि, उनका तर्क है कि भाषा का ज्ञान न होने के आधार पर किसी चालक का लाइसेंस निलंबित करना या उसकी आजीविका प्रभावित करना उचित नहीं है।
याचिका में बॉम्बे हाईकोर्ट के 1 मार्च 2017 के फैसले का भी हवाला दिया गया है, जिसमें ऑटो-रिक्शा परमिट के लिए मराठी भाषा का ज्ञान अनिवार्य करने वाले एक सर्कुलर को रद्द कर दिया गया था। अब नए नियम पर हाईकोर्ट के रुख पर सभी की नजरें टिकी हैं।


