देश में लोकसभा सीटों के परिसीमन को लेकर राजनीतिक और संवैधानिक चर्चा तेज हो गई है। इसकी बड़ी वजह संसद में परिसीमन विधेयक, 2026 और संविधान विधेयक, 2026 से जुड़ी चर्चाएं हैं। प्रस्तावित बदलावों के तहत लोकसभा सीटों की संख्या मौजूदा 543 से बढ़ाकर करीब 815 से 850 तक किए जाने की संभावना जताई जा रही है। यह प्रक्रिया महिला आरक्षण कानून यानी नारी शक्ति वंदन अधिनियम के क्रियान्वयन से भी जुड़ी हुई है।
नए संसद भवन के निर्माण ने भी परिसीमन की चर्चा को बढ़ावा दिया है। नए लोकसभा कक्ष में 888 सांसदों और राज्यसभा कक्ष में 384 सदस्यों के बैठने की व्यवस्था की गई है। वर्तमान में लोकसभा सीटों का निर्धारण 1971 की जनगणना के आधार पर किया गया था। पिछले कई दशकों में देश की आबादी और राज्यों के जनसांख्यिकीय आंकड़ों में काफी बदलाव आया है, जिसके कारण सीटों के नए सिरे से निर्धारण की मांग उठ रही है। अगर नई जनगणना के आधार पर परिसीमन लागू होता है, तो देश का राजनीतिक संतुलन बदल सकता है। आबादी के आधार पर सीटों के बंटवारे से अधिक जनसंख्या वाले राज्यों की लोकसभा में हिस्सेदारी बढ़ सकती है। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों को इसका सबसे ज्यादा लाभ मिलने की संभावना जताई जा रही है।
वहीं, दक्षिण भारत के राज्यों की चिंता है कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने के बावजूद उनका संसद में प्रभाव कम हो सकता है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों का तर्क है कि केवल आबादी के आधार पर सीटों का निर्धारण उनके प्रतिनिधित्व को प्रभावित कर सकता है। पूर्वी और पहाड़ी राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल, ओडिशा, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड पर इसका असर अपेक्षाकृत कम रहने का अनुमान है। केंद्र सरकार ने संकेत दिया है कि परिसीमन की प्रक्रिया में सभी राज्यों के हितों का ध्यान रखा जाएगा और किसी भी राज्य के साथ अन्याय नहीं होगा।


