नई दिल्ली | 4 मार्च 2026
वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेज़ उछाल के बीच भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर ₹92.17 पर पहुंच गया। बुधवार सुबह 10:40 बजे के आसपास रुपया पहली बार ₹92 के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गया, जिससे बाजार में हलचल तेज़ हो गई।
कच्चे तेल की ‘आग’ से बढ़ा दबाव
रुपये में गिरावट की सबसे बड़ी वजह मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के कारण कच्चे तेल की सप्लाई में संभावित रुकावट का डर है। यह क्षेत्र वैश्विक ऊर्जा निर्यात का बड़ा केंद्र है। सप्लाई बाधित होने की आशंका से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें तेज़ी से बढ़ी हैं।
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की ज़रूरत का करीब 85% आयात करता है। ऐसे में तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से देश का आयात बिल बढ़ता है, महंगाई पर दबाव आता है और चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) बढ़ने का खतरा रहता है। इन सभी कारकों का सीधा असर रुपये की मजबूती पर पड़ता है।
मजबूत डॉलर से दोहरी मार
डॉलर की वैश्विक मजबूती ने रुपये की गिरावट को और गहरा कर दिया है। बढ़ती अनिश्चितता और जोखिम से बचने की प्रवृत्ति के चलते निवेशक अमेरिकी डॉलर और अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड जैसे सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं।
जब वैश्विक स्तर पर ‘सेफ हेवन’ की मांग बढ़ती है, तो पूंजी उभरते बाजारों से निकलकर अमेरिका की ओर जाती है। इस पूंजी प्रवाह में बदलाव से भारतीय रुपया समेत अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर दबाव बढ़ता है।
वैश्विक बाजारों में उथल-पुथल
वॉल स्ट्रीट में कमजोरी के बाद एशियाई शेयर बाजारों में भी गिरावट दर्ज की गई। निवेशकों ने जोखिम वाले एसेट्स में निवेश कम कर दिया है। करेंसी बाजार विशेष रूप से भू-राजनीतिक घटनाओं पर तेज़ प्रतिक्रिया देते हैं, खासकर जब मामला तेल उत्पादक क्षेत्रों से जुड़ा हो।
आगे क्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में रुपये की दिशा काफी हद तक मिडिल ईस्ट की स्थिति और कच्चे तेल की कीमतों पर निर्भर करेगी। यदि तनाव और बढ़ता है और तेल महंगा बना रहता है, तो रुपये पर दबाव जारी रह सकता है।
फिलहाल बाजार की नजरें अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम, तेल की चाल और विदेशी निवेश के रुझान पर टिकी हैं, जो भारतीय मुद्रा की आगे की दिशा तय करेंगे।









