नए स्मार्टफोन खरीदते ही कई एप पहले से ही आपके डिवाइस में मौजूद होते हैं। गूगल, यूट्यूब, प्ले स्टोर और क्रोम जैसी एप्स अक्सर डिवाइस में इंस्टॉल होकर आती हैं। तकनीकी भाषा में इन्हें ‘प्री-इंस्टॉल्ड एप’ कहा जाता है। हाल ही में संसद के शीतकालीन सत्र में यह मुद्दा चर्चा में आया। सरकार ने कुछ एप्स को फोन में पहले से इंस्टॉल करने का आदेश दिया, जिसे विपक्ष ने डेटा सुरक्षा के लिहाज से चुनौती दी। विपक्ष का तर्क था कि ऐसे एप्स यूजर्स के निजी डेटा को खतरे में डाल सकते हैं।
भारत में फिलहाल प्री-इंस्टॉल्ड एप्स को हटाने का कोई कानून नहीं है। ज्यादातर कंपनियां अपने फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस में पहले से एप इंस्टॉल करके देती हैं, और यूजर्स इन्हें खुद डिलीट नहीं कर सकते। 2023 में सरकार ने एक प्रस्ताव रखा था जिसमें यूजर्स को इन एप्स को डिलीट करने का विकल्प देने की बात कही गई थी, लेकिन यह अभी तक लागू नहीं हो पाया। दूसरे देशों की तुलना में भारत की स्थिति अलग है। यूरोपीय यूनियन में प्री-इंस्टॉल्ड एप्स को हटाने की सुविधा देना अनिवार्य है, जिससे यूजर अपनी जरूरत और पसंद के अनुसार एप्स को इंस्टॉल या हटाने में स्वतंत्र होते हैं। वहीं अमेरिका में इस विषय पर कोई स्पष्ट कानून नहीं है, लेकिन अगर कोई कंपनी दूसरों के प्री-इंस्टॉल्ड एप्स से प्रभावित होती है, तो एंटी-ट्रस्ट नियम के तहत शिकायत कर सकती है।
इस पूरे मामले से स्पष्ट होता है कि भारत में अभी यूजर्स का नियंत्रण सीमित है। प्री-इंस्टॉल्ड एप्स को हटाने का अधिकार देने के लिए सरकार के प्रस्ताव अभी भी लंबित हैं, और इसे लेकर आगे क्या निर्णय होता है, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।









