राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में अपने संगठन के पंजीकरण को लेकर उठ रही बहस पर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि RSS को व्यक्तियों के समूह के रूप में मान्यता प्राप्त है और इसे कानूनी दृष्टि से पूर्ण रूप से मान्यता प्राप्त संगठन माना जाता है। भागवत ने यह भी कहा, “यहां तक कि हिंदू धर्म भी पंजीकृत नहीं है।”
भागवत ने RSS के इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि 1925 में संगठन की स्थापना के समय ब्रिटिश सरकार के साथ पंजीकरण करवाना प्रासंगिक नहीं था। उन्होंने आगे कहा कि आजादी के बाद भी भारत में पंजीकरण अनिवार्य नहीं था।
उन्होंने संगठन की कानूनी स्थिति और कर-मुक्त पहचान पर प्रकाश डालते हुए बताया कि आयकर विभाग और अदालतों ने RSS को व्यक्तियों के निकाय के रूप में मान्यता दी है। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि संगठन पर तीन बार प्रतिबंध लगाया गया था, जो RSS के अस्तित्व और मान्यता का प्रमाण है।
भागवत ने RSS के मिशन पर भी बात की। उनका कहना था कि संगठन केवल हिंदू समाज को संगठित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय गौरव और सामाजिक जिम्मेदारी को बढ़ावा देने का काम करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदू समाज की परिभाषा में सभी भारतीय शामिल हैं, चाहे वे मुसलमान, ईसाई या अन्य धर्म के हों।
उन्होंने यह भी बताया कि RSS गैर-हिंदुओं के साथ संवाद स्थापित करने के प्रयास कर रहा है और समाज में सहयोग और एकता के लिए सक्रिय भूमिका निभा रहा है।भागवत की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब कर्नाटक के नेताओं ने RSS की सार्वजनिक गतिविधियों और वित्तीय पारदर्शिता पर सवाल उठाए थे।









