दिल्ली में बढ़ते वायु प्रदूषण को देखते हुए सरकार ने वाहनों के प्रवेश को लेकर सख्त नियम लागू किए हैं। 1 नवंबर 2026 से 31 जनवरी 2027 तक दिल्ली के बाहर पंजीकृत BS-6 से कम मानक वाले पेट्रोल और डीजल वाहनों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया गया है। हालांकि, इलेक्ट्रिक और CNG वाहनों को इससे छूट दी गई है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर भारत ने BS-4 के बाद BS-5 लागू करने के बजाय सीधे BS-6 क्यों अपनाया? दरअसल, BS यानी भारत स्टेज वाहनों से निकलने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए बनाए गए उत्सर्जन मानक हैं। इनके तहत कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और हानिकारक कणों के उत्सर्जन की अधिकतम सीमा तय होती है। हर नया मानक पिछले मानक की तुलना में ज्यादा सख्त होता है।
भारत में पहला BS मानक वर्ष 2000 में लागू हुआ था। इसके बाद BS-2, BS-3 और BS-4 को अलग-अलग चरणों में लागू किया गया। 1 अप्रैल 2017 से देशभर में BS-4 मानक अनिवार्य हुआ। इसके बाद 1 अप्रैल 2020 से सीधे BS-6 लागू कर दिया गया। BS-5 को छोड़ने की सबसे बड़ी वजह समय और संसाधनों की बचत थी। अगर पहले BS-5 और फिर BS-6 लागू किया जाता, तो वाहन कंपनियों और तेल कंपनियों को कम समय में दो बार बड़े तकनीकी बदलाव करने पड़ते। इससे वाहन निर्माताओं के साथ ग्राहकों पर भी अतिरिक्त खर्च का बोझ पड़ सकता था।
इसके अलावा, बढ़ते वायु प्रदूषण को देखते हुए अधिक सख्त मानक अपनाना जरूरी समझा गया। BS-6 के लिए कम सल्फर वाले बेहतर ईंधन और आधुनिक प्रदूषण नियंत्रण तकनीक की आवश्यकता होती है। BS-4 के मुकाबले BS-6 में खासतौर पर डीजल वाहनों से निकलने वाले नाइट्रोजन ऑक्साइड और कणीय पदार्थों की सीमा कम की गई है। हालांकि, BS-6 वाहन भी प्रदूषण फैलाते हैं, लेकिन निर्धारित सीमा के भीतर। दिल्ली में सर्दियों के दौरान वाहनों के साथ धूल, निर्माण कार्य और पराली का धुआं भी प्रदूषण बढ़ाते हैं। इसलिए वाहन मालिकों को दिल्ली जाने से पहले अपनी RC में उत्सर्जन मानक, PUC प्रमाणपत्र और सरकार के ताजा निर्देश जरूर जांचने चाहिए। साफ हवा के लिए केवल वाहन प्रतिबंध नहीं, बल्कि सार्वजनिक परिवहन और अन्य प्रदूषण स्रोतों पर नियंत्रण भी जरूरी है।


