सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि गृहिणियों का घरेलू कार्य केवल परिवार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और समाज निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान है। कोर्ट ने कहा कि महिलाएं केवल “हाउसवाइफ” नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण में अहम भूमिका निभाने वाली “राष्ट्र निर्माता” हैं।
यह फैसला सड़क दुर्घटना में एक गृहिणी की मृत्यु से जुड़े मुआवजा मामले में सुनाया गया। कोर्ट ने माना कि घरेलू कार्य का आर्थिक मूल्य भी होता है और मुआवजे की गणना में इसे शामिल किया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि गृहिणी द्वारा परिवार को दी जाने वाली सेवाओं के नुकसान को “लॉस ऑफ डोमेस्टिक केयर” के रूप में अलग से मुआवजे में जोड़ा जाएगा।
मामला वर्ष 2001 में फतेहाबाद के पास हुए एक सड़क हादसे से जुड़ा था, जिसमें एक महिला की मौत हो गई थी। शुरुआत में ट्रिब्यूनल ने 2 लाख रुपये का मुआवजा दिया था, जिसे बाद में हाईकोर्ट ने बढ़ाकर 8.43 लाख रुपये कर दिया। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां अदालत ने महिला के घरेलू योगदान का विस्तृत मूल्यांकन करते हुए कुल मुआवजा 62.77 लाख रुपये निर्धारित किया।
कोर्ट ने यह भी दिशा-निर्देश दिए कि गृहिणी की न्यूनतम मासिक आय 30 हजार रुपये मानी जाएगी और भविष्य की संभावनाओं तथा अन्य वित्तीय कारकों को जोड़कर मुआवजा तय किया जाएगा। यदि कोई महिला नौकरी के साथ घरेलू कार्य भी करती है, तो उसके मामले में घरेलू सेवाओं का मूल्य अतिरिक्त लाभ के रूप में जोड़ा जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि भारत में महिलाओं का अवैतनिक घरेलू श्रम देश की जीडीपी में महत्वपूर्ण योगदान देता है, लेकिन अक्सर इसे आर्थिक गणना में शामिल नहीं किया जाता। अदालत ने लंबित मामलों पर भी चिंता जताई और न्याय में देरी को अस्वीकार्य बताया। यह फैसला महिलाओं के घरेलू कार्य को कानूनी और आर्थिक पहचान देने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।









