भारत में कई शहर अपनी खास परंपराओं और हुनर के लिए पहचाने जाते हैं। कर्नाटक का चन्नापटना भी ऐसी ही एक अनोखी जगह है, जिसे भारत का ‘टॉय सिटी’ या ‘खिलौनों का शहर’ कहा जाता है। बेंगलुरु और मैसूरु के बीच स्थित यह शहर सड़क किनारे सजी रंग-बिरंगी लकड़ी की गुड़िया, जानवरों, लट्टू और दूसरे खिलौनों की वजह से खास पहचान रखता है।
स्थानीय भाषा में चन्नापटना को ‘गोम्बेगाला ऊरु’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है ‘खिलौनों का शहर’। यहां लकड़ी के खिलौने बनाने की परंपरा करीब 300 साल पुरानी मानी जाती है। खास बात यह है कि इन खिलौनों पर प्राकृतिक रंगों और लाख की मदद से चिकनी और चमकदार फिनिश दी जाती है।
चन्नापटना के खिलौनों की कहानी मैसूर के शासक टीपू सुल्तान से भी जोड़ी जाती है। माना जाता है कि उन्होंने फारसी लाख के खिलौनों से प्रभावित होकर कारीगरों को यह तकनीक सीखने के लिए प्रोत्साहित किया। बाद में 1904 में स्थानीय कारीगर मियां बावास्मिया ने जापान जाकर लाख वेयर तकनीक सीखी और लौटकर दूसरे शिल्पकारों को प्रशिक्षित किया।
समय के साथ इस कला ने भी नया रूप लिया। पारंपरिक खिलौनों के अलावा अब यहां लैंप, कोस्टर, कटोरियां, गहने और सजावटी सामान भी बनाए जाते हैं। वर्ष 2006 में चन्नापटना के खिलौनों और गुड़ियों को GI टैग मिला, जिससे इस सदियों पुरानी कारीगरी को आधिकारिक पहचान मिली। आज चन्नापटना की यात्रा सिर्फ खरीदारी नहीं, बल्कि जीवंत भारतीय शिल्प परंपरा को करीब से देखने का अनुभव भी देती है।


