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ग्लोबल वॉर्मिंग से संकट में हिमालय: ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे, जल सुरक्षा पर बड़ा खतरा

दुनिया भर में ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु परिवर्तन का असर अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है, और इसका सबसे गंभीर प्रभाव पर्वतीय क्षेत्रों पर पड़ रहा है। विशेष रूप से हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र, जिसे “तीसरा ध्रुव” भी कहा जाता है, तेजी से बदलते तापमान के कारण बड़े संकट से गुजर रहा है। यह क्षेत्र न केवल एशिया के कई देशों को प्रभावित करता है, बल्कि भारत, नेपाल, भूटान और पाकिस्तान जैसे देशों की करोड़ों आबादी के लिए जीवन रेखा भी है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, हिमालयी ग्लेशियर हर दशक में औसतन 30 से 60 मीटर पीछे हट रहे हैं, जो एक गंभीर चेतावनी है।

उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में स्थित गंगोत्री ग्लेशियर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जो गंगा नदी का प्रमुख स्रोत है। यह ग्लेशियर हर साल लगभग 28–30 मीटर की दर से सिकुड़ रहा है और 1935 से अब तक लगभग 1700 मीटर पीछे हट चुका है। विशेषज्ञों के अनुसार, ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण गर्मियों में तापमान वृद्धि और कम बर्फबारी इस तेज पिघलाव के मुख्य कारण हैं। देहरादून स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी समेत कई संस्थानों की रिपोर्ट बताती है कि हिमालयी ग्लेशियरों का पिघलना अब दोगुनी गति से बढ़ रहा है।

चिंता की बात यह है कि हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में मौजूद लगभग 9,975 ग्लेशियरों में से 900 केवल उत्तराखंड में हैं, और ये सभी ग्लेशियर भारत की बड़ी आबादी के लिए जल स्रोत हैं। अनुमान है कि यदि हालात ऐसे ही रहे तो इस सदी के अंत तक 75% तक बर्फ खत्म हो सकती है। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का सीधा असर नदियों पर पड़ेगा, जिससे देश की लगभग 40% आबादी की जल आपूर्ति, सिंचाई और आजीविका प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर यह स्थिति जारी रही तो करोड़ों लोगों के लिए वैकल्पिक जल और रोजगार संसाधन उपलब्ध कराना बेहद कठिन होगा।

नेपाल जैसे देश, जो जलवायु जोखिम के मामले में अत्यधिक संवेदनशील हैं, वहां भी बाढ़, भूस्खलन, अनियमित मानसून और कृषि उत्पादन में गिरावट जैसे प्रभाव लगातार बढ़ रहे हैं। वैज्ञानिक संस्थान ICIMOD की चेतावनी है कि यदि वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे नहीं रोका गया, तो इस सदी के अंत तक हिमालय के 80% ग्लेशियर खत्म हो सकते हैं। ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण केवल पर्वतीय क्षेत्र ही नहीं, बल्कि पूरी पृथ्वी का पारिस्थितिक संतुलन प्रभावित हो रहा है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि ग्लेशियर पृथ्वी के “वाटर टावर” हैं, जो न केवल मीठा पानी उपलब्ध कराते हैं, बल्कि वैश्विक जलवायु को संतुलित रखने में भी अहम भूमिका निभाते हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि इस संकट से निपटने के लिए औद्योगिक प्रदूषण में कमी, पर्यटन पर नियंत्रण और पारंपरिक जल संरक्षण तकनीकों जैसे “स्नो हार्वेस्टिंग” को पुनर्जीवित करने की जरूरत है। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में यह संकट और भी भयावह रूप ले सकता है, जिससे मानव जीवन और पारिस्थितिकी तंत्र दोनों पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।