भारत की राजनीति में चुनाव जीतने के बाद नेताओं के पार्टी बदलने का सिलसिला लगातार चर्चा में रहता है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और नेशनल इलेक्शन वॉच की रिपोर्ट के मुताबिक, 2022 से 2026 के बीच कम से कम 111 सांसदों और विधायकों ने चुनाव जीतने के बाद अपनी पार्टी बदली। इनमें 24 लोकसभा सांसद, 7 राज्यसभा सदस्य और 78 विधायक शामिल हैं। हालांकि, ADR ने स्पष्ट किया है कि यह आंकड़ा पूर्ण नहीं है, क्योंकि जनप्रतिनिधियों के पार्टी बदलने का कोई आधिकारिक केंद्रीकृत रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।
रिपोर्ट के अनुसार, नागालैंड में सबसे ज्यादा 32 विधायकों ने पार्टी बदली। इसके बाद पश्चिम बंगाल में 20, तेलंगाना में 9, जबकि गोवा और पंजाब में 8-8 मामले सामने आए। मेघालय और महाराष्ट्र में 6-6 तथा मणिपुर में 5 मामले दर्ज किए गए। दलबदल रोकने के लिए 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए दसवीं अनुसूची लागू की गई। इसके तहत पार्टी की सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ने, पार्टी व्हिप के खिलाफ मतदान करने या निर्दलीय निर्वाचित होने के बाद किसी दल में शामिल होने जैसी परिस्थितियों में सदस्य को अयोग्य ठहराया जा सकता है। इसका फैसला संबंधित सदन के स्पीकर या सभापति करते हैं, हालांकि यह न्यायिक समीक्षा के दायरे में आता है।
कानून में सबसे अहम अपवाद पार्टी के विलय से जुड़ा है। यदि किसी दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य दूसरे दल में विलय का समर्थन करते हैं, तो उन्हें दलबदल कानून के तहत अयोग्यता से छूट मिल सकती है। 2003 में 91वें संविधान संशोधन के जरिए यह सीमा एक-तिहाई से बढ़ाकर दो-तिहाई की गई थी। इसके अलावा, स्पीकर के फैसले में देरी भी बड़ा मुद्दा है। अयोग्यता याचिकाओं पर स्पष्ट वैधानिक समय-सीमा न होने के कारण कई मामले लंबे समय तक लंबित रह सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने समयबद्ध फैसले की जरूरत पर जोर दिया है, लेकिन इसे अभी कानून में अनिवार्य समय-सीमा के रूप में शामिल नहीं किया गया है।


