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UGC के नए जातिगत भेदभाव विरोधी नियमों पर फिर होगा विचार, केंद्र सरकार बनाएगी विशेष समिति

देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए लागू किए गए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों को लेकर केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाने के संकेत दिए हैं। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी है कि इन नियमों की दोबारा समीक्षा की जा रही है। इसके लिए सभी पहलुओं पर विचार करने और एक विशेष समिति गठित करने की प्रक्रिया भी चल रही है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि सरकार ऐसा समाधान चाहती है, जिससे किसी भी वर्ग के छात्रों के मन में असुरक्षा या भेदभाव की भावना पैदा न हो। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश की नीतियां ऐसी होनी चाहिए, जिनसे हर युवा खुद को सुरक्षित और सम्मानित महसूस करे। अदालत ने सरकार के आश्वासन को रिकॉर्ड पर लेते हुए अगली सुनवाई चार सप्ताह के लिए टाल दी।

यह मामला अबेदा सलीम तडवी बनाम भारत संघ और इससे जुड़ी याचिकाओं से संबंधित है। वर्ष 2019 में रोहित वेमुला और पायल तडवी की माताओं ने कैंपस में कथित जातिगत उत्पीड़न के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। उनकी मांग थी कि उच्च शिक्षण संस्थानों में वंचित वर्गों के विद्यार्थियों की सुरक्षा के लिए प्रभावी नियम बनाए जाएं। इसी प्रक्रिया के तहत यूजीसी ने जनवरी 2026 में नए नियम अधिसूचित किए थे। हालांकि, नियमों की कुछ व्यवस्थाओं को लेकर विवाद खड़ा हो गया। खासतौर पर रेगुलेशन 3(1)(c) में जातिगत भेदभाव की परिभाषा पर सवाल उठाए गए। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इसमें एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों को ही शामिल किया गया है, जिससे सामान्य वर्ग के छात्रों के साथ भेदभाव की आशंका पैदा हो सकती है। वहीं, दूसरे पक्ष का तर्क है कि सामाजिक असमानता दूर करने के लिए वंचित समुदायों को विशेष संरक्षण देना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी को नए नियमों पर अंतरिम रोक लगाते हुए 2012 के दिशानिर्देश लागू रखने का आदेश दिया था। अब केंद्र की समीक्षा और प्रस्तावित समिति से इस विवाद का संतुलित समाधान निकलने की उम्मीद है।