केंद्र सरकार ने एथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी और गन्ने के रस के इस्तेमाल पर प्रतिबंध के बाद अब चावल और खराब खाद्यान्न से बनने वाले एथेनॉल की मात्रा भी सीमित कर दी है। इस फैसले से एथेनॉल उत्पादक कंपनियों की मक्के पर निर्भरता बढ़ने की संभावना है। उद्योग जगत के अनुमानों के मुताबिक, वर्ष 2026-27 में एथेनॉल उत्पादन के लिए मक्के की मांग करीब 22 प्रतिशत बढ़कर 1.6 करोड़ टन तक पहुंच सकती है, जबकि मौजूदा आपूर्ति वर्ष में यह लगभग 1.3 करोड़ टन रहने का अनुमान है। तीन नवंबर को जारी संशोधित टेंडर की शर्तों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 की शुरुआती तीन तिमाहियों में भारतीय खाद्य निगम (FCI) के अतिरिक्त चावल से अधिकतम 324 करोड़ लीटर एथेनॉल का उत्पादन किया जा सकेगा। वहीं, खराब खाद्यान्न से एथेनॉल उत्पादन की सालाना सीमा 160 करोड़ लीटर निर्धारित की गई है। इस तरह दोनों स्रोतों से कुल 484 करोड़ लीटर एथेनॉल की आपूर्ति हो सकेगी, जो तेल विपणन कंपनियों के 1,100 करोड़ लीटर के कुल टेंडर का लगभग 44 प्रतिशत है।
नई शर्तों के तहत कोई भी एथेनॉल उत्पादक अपनी तिमाही पेशकश में एफसीआई के चावल से बने एथेनॉल का हिस्सा 30 प्रतिशत से अधिक नहीं रख सकेगा। सभी कंपनियों के लिए इस स्रोत से प्रति तिमाही अधिकतम 108 करोड़ लीटर की सीमा निर्धारित की गई है। सरकार ने एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल कार्यक्रम के लिए 72 लाख टन अतिरिक्त चावल भी आवंटित किया है, जिसकी वैधता 30 जून 2027 तक रहेगी। खराब खाद्यान्न से बने एथेनॉल की खरीद प्रत्येक तिमाही में अधिकतम 40 करोड़ लीटर तक सीमित होगी। इससे पहले सरकार ने नवंबर 2026 से अक्टूबर 2027 तक के आपूर्ति वर्ष के लिए गन्ने के रस, चीनी, चीनी सिरप और बी-हैवी शीरे से बने एथेनॉल की खरीद पर रोक लगा दी थी। हालांकि, सी-हैवी शीरे को इस प्रतिबंध से बाहर रखा गया है। उत्पादन में गिरावट और चीनी की उपलब्धता को देखते हुए यह कदम उठाया गया है। इस बदलाव का असर चीनी मिलों की अतिरिक्त आय और किसानों के गन्ना भुगतान पर भी पड़ सकता है।
कृषि बाजार विशेषज्ञ जीके सूद के मुताबिक, खराब खाद्यान्न के इस्तेमाल पर सीमा तय होना खाद्यान्न की उपलब्धता को लेकर बढ़ती चिंताओं का संकेत है। उनका अनुमान है कि सी-हैवी शीरे से तेल कंपनियों को करीब 50 करोड़ लीटर एथेनॉल ही उपलब्ध हो सकेगा, क्योंकि इसकी मांग शराब और अन्य उद्योगों में भी बनी हुई है। सरकार के इन फैसलों के बाद मक्का एथेनॉल उत्पादन के लिए एक महत्वपूर्ण कच्चे माल के रूप में उभर सकता है। मांग बढ़ने से मक्का उत्पादक किसानों को नए अवसर मिल सकते हैं, हालांकि पशु आहार और अन्य उद्योगों के लिए इसकी उपलब्धता तथा कीमतों पर भी असर पड़ने की आशंका है।


