हाल ही में विदेश मंत्रालय के इस बयान के बाद नई बहस छिड़ गई है कि पासपोर्ट नागरिकता साबित करने का दस्तावेज नहीं, बल्कि केवल एक यात्रा दस्तावेज है। इसके बाद लोगों के मन में सवाल उठने लगा है कि आखिर भारतीय नागरिकता का वास्तविक प्रमाण क्या माना जाता है।
सरकार पहले भी स्पष्ट कर चुकी है कि आधार कार्ड और वोटर आईडी पहचान के दस्तावेज हैं, लेकिन इन्हें नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसी तरह पासपोर्ट भी नागरिकता की पुष्टि का निर्णायक दस्तावेज नहीं है, हालांकि इसे जारी करने से पहले नागरिकता संबंधी जांच की जाती है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 5 से 11 तक नागरिकता से जुड़े प्रावधानों का उल्लेख है। वहीं, नागरिकता अधिनियम 1955 में यह तय किया गया है कि किस आधार पर किसी व्यक्ति को भारतीय नागरिकता मिल सकती है। इसमें जन्म, वंश, पंजीकरण, नैचुरलाइजेशन और किसी क्षेत्र के भारत में विलय जैसे आधार शामिल हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार भारत में नागरिकता साबित करने के लिए कोई एक सार्वभौमिक दस्तावेज निर्धारित नहीं है। आमतौर पर जन्म प्रमाण पत्र (बर्थ सर्टिफिकेट) को महत्वपूर्ण प्रमाण माना जाता है, क्योंकि यह व्यक्ति के जन्म स्थान और तिथि की पुष्टि करता है। हालांकि नागरिकता साबित करने के नियम व्यक्ति के जन्म वर्ष के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।
1 जुलाई 1987 से पहले जन्मे लोगों के लिए भारत में जन्म का प्रमाण पर्याप्त माना जाता है। इसके बाद जन्मे लोगों को माता-पिता की नागरिकता से जुड़े अतिरिक्त प्रमाण भी देने पड़ सकते हैं। 3 दिसंबर 2004 के बाद जन्म लेने वालों के लिए नियम और अधिक सख्त हैं।
पूर्व विदेश सचिव निरुपमा मेनन राव के अनुसार पासपोर्ट नागरिकता का मजबूत संकेतक जरूर है, लेकिन किसी कानूनी विवाद की स्थिति में इसे अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में नागरिकता अधिनियम और अन्य दस्तावेजों के आधार पर नागरिकता निर्धारित की जाती है।









