भारतीय राजनीति में इन दिनों दल-बदल और बागी गुटों को लेकर हलचल काफी तेज हो गई है। पश्चिम बंगाल से शुरू हुआ यह विवाद अब महाराष्ट्र तक पहुंच गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, पश्चिम बंगाल में टीएमसी के कई विधायकों ने अलग गुट बनाकर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष को लेकर नया दावा पेश किया, जिसे विधानसभा स्पीकर ने मान्यता दे दी। वहीं संसद में भी टीएमसी के सांसदों के एक समूह द्वारा अलग गुट बनाकर विलय की मांग करने की चर्चा रही है, हालांकि इस पर अंतिम निर्णय अभी लंबित है।
इस पूरे मामले में संविधान और दल-बदल विरोधी कानून की व्याख्या को लेकर बहस तेज हो गई है। संविधान के अनुसार, यदि किसी पार्टी के दो-तिहाई से अधिक सदस्य एक साथ अलग होते हैं या विलय करते हैं, तो उन्हें अयोग्य नहीं माना जाता। ऐसे मामलों में स्पीकर गुट को मान्यता देने पर विचार कर सकते हैं, लेकिन यह प्रक्रिया पूरी तरह कानूनी और संवैधानिक प्रावधानों पर आधारित होती है।
चुनाव आयोग भी ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, क्योंकि वही तय करता है कि मूल पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न किस गुट को मिलेगा। स्पीकर किसी भी निर्णय से पहले दोनों पक्षों की सुनवाई करते हैं और आवश्यक होने पर कानूनी सलाह लेते हैं। वहीं, यदि बागी विधायकों की संख्या दो-तिहाई से कम होती है, तो उनके लिए अलग गुट के रूप में मान्यता पाना मुश्किल हो जाता है और उन पर दल-बदल कानून के तहत कार्रवाई भी हो सकती है।
बंगाल में इस विवाद को लेकर मामला अब कलकत्ता हाई कोर्ट तक पहुंच चुका है, जहां स्पीकर के फैसले की वैधता पर सवाल उठाए गए हैं। अदालत ने प्रक्रिया और नियमों के पालन की जांच शुरू कर दी है। कांग्रेस और शिवसेना जैसे दलों के इतिहास में भी इस तरह के कई बड़े विभाजन देखे गए हैं, जिन्होंने देश की राजनीति को लंबे समय तक प्रभावित किया है। वर्तमान स्थिति भी उसी दिशा में एक नया राजनीतिक और संवैधानिक विवाद बनती दिख रही है।









