सुप्रीम कोर्ट ने प्रयागराज में दर्ज POCSO मामले में ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को बड़ी राहत देते हुए उनकी अग्रिम जमानत को बरकरार रखा है। अदालत ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें 25 मार्च को उन्हें अग्रिम जमानत दी गई थी।
जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस एन.के. सिंह की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता की दलीलों पर सवाल उठाए। शिकायतकर्ता आशुतोष ब्रह्मचारी ने एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड सौरभ अजय गुप्ता के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि हाई कोर्ट ने मामले की गंभीरता और नाबालिगों के यौन शोषण से जुड़े आरोपों पर पर्याप्त विचार नहीं किया।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने शिकायतकर्ता से पूछा कि यदि उन्हें कथित घटनाओं की जानकारी पहले से थी, तो पुलिस को सूचना देने में छह दिन की देरी क्यों हुई। रिकॉर्ड के अनुसार, पीड़ितों ने 18 जनवरी 2026 को शिकायतकर्ता को घटनाओं के बारे में बताया था, लेकिन पुलिस से संपर्क 24 जनवरी को किया गया। शिकायतकर्ता ने देरी का कारण पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों में व्यस्त होना बताया।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने 22 पन्नों के आदेश में इस देरी को महत्वपूर्ण माना था। कोर्ट ने यह भी कहा था कि शिकायतकर्ता पूजा में व्यस्त होने का दावा कर रहे थे, जबकि उसी दौरान उन्होंने 21 जनवरी को एक अन्य मामले में अलग अर्जी दाखिल की थी।
हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की उस दलील को भी खारिज कर दिया था, जिसमें POCSO एक्ट की धारा 29 के तहत आरोपी के खिलाफ कानूनी धारणा लागू होने की बात कही गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह प्रावधान गिरफ्तारी से पहले के चरण में लागू नहीं होता। कोर्ट ने मामले में मीडिया ट्रायल पर भी नाराजगी जताई थी।









