वोटर लिस्ट में कथित अनियमितताओं और चुनाव आयोग की ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविजन’ (SIR) प्रक्रिया को लेकर विपक्ष का विरोध लगातार तेज़ होता जा रहा है। विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग कर रहे हैं। इसी बीच 42 पूर्व जजों और संवैधानिक पदों पर रह चुके लोगों ने चुनाव आयोग समेत संवैधानिक संस्थाओं के समर्थन में खुला पत्र जारी किया है। 7 अक्टूबर को जारी इस पत्र में पूर्व जजों ने संवैधानिक संस्थाओं पर लगातार हो रहे हमलों को लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया। उन्होंने कहा कि बिना ठोस सबूत के चुनावी गड़बड़ी के बार-बार लगाए जाने वाले आरोप जनता के बीच लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और भरोसे को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
पत्र में यह भी कहा गया कि संवैधानिक संस्थाओं की आलोचना करना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है, लेकिन किसी संस्था को बदनाम करना या उसकी विश्वसनीयता को जानबूझकर कमजोर करना स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। पूर्व जजों ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं को सार्वजनिक तौर पर ‘चोर’, ‘कठपुतली’ और ‘समझौता करने वाली’ संस्था कहा जा रहा है। साथ ही चुनाव अधिकारियों की पहचान सार्वजनिक करने और उन्हें भविष्य में कार्रवाई की चेतावनी देने पर भी चिंता जताई गई।
पूर्व जजों ने विपक्ष के ‘वोट चोरी’ के आरोपों पर भी सवाल उठाया। उनका कहना है कि ऐसे आरोप मुख्यतः प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से लगाए गए हैं, जबकि आयोग की ओर से शपथ-पत्र या ठोस कानूनी प्रमाण मांगे जाने पर पर्याप्त दस्तावेज़ पेश नहीं किए गए। पत्र में EVM को लेकर उठाए जाने वाले सवालों पर भी निशाना साधा गया। हस्ताक्षरकर्ताओं ने पूछा कि चुनावी हार के बाद EVM पर सवाल क्यों उठाए जाते हैं, जबकि इन्हीं मशीनों से मिली जीत को आम तौर पर चुनौती नहीं दी जाती।


