Religion

संत प्रेमानंद महाराज ने शिष्यों को दिया भावुक संदेश: देह के बाद भी नाम और वाणी ही बनेंगे मार्ग

वृंदावन के केली कुंज आश्रम में हाल ही में हुए सत्संग के दौरान एक शिष्य ने प्रेमानंद महाराज से ऐसा प्रश्न पूछ लिया, जिसने पूरे वातावरण को भावुक कर दिया। शिष्य ने जानना चाहा कि महाराज के देह त्यागने के बाद शिष्यों की क्या स्थिति होगी और उनके लिए गुरु की आज्ञा क्या रहेगी। इस पर प्रेमानंद महाराज ने अत्यंत सरल, करुणामय और गहन आध्यात्मिक दृष्टि से उत्तर दिया।

उन्होंने कहा कि जब तक महापुरुषों का शरीर संसार में रहता है, तब तक उनका प्रभाव सबसे सजीव रूप में अनुभव होता है। प्रत्यक्ष दर्शन, सानिध्य और संवाद से जो शांति और ऊर्जा मिलती है, वह किसी भी माध्यम से पूरी तरह संभव नहीं हो पाती। संत के शरीर त्यागने के बाद स्वाभाविक रूप से एक रिक्तता का अनुभव होता है। गुरु की तुलना उन्होंने मां से करते हुए कहा कि जैसे बच्चे के लिए मां का सान्निध्य अमूल्य होता है, वैसे ही शिष्य के लिए गुरु का प्रत्यक्ष मार्गदर्शन जीवनदायी होता है।

महाराज ने स्पष्ट किया कि गुरु के देह त्याग के बाद भी शिष्य कभी अनाथ नहीं होता। उस समय शिष्यों के लिए गुरु की सबसे बड़ी आज्ञा उनका दिया हुआ नाम, मंत्र, वाणी और सिद्धांत बन जाते हैं। जो साधक गुरु द्वारा बताई गई साधना पद्धति को निष्ठा से अपनाए रखता है, वह भीतर से कभी अकेला नहीं होता।

उन्होंने शिष्यों को प्रेरित किया कि जब तक संत का सानिध्य उपलब्ध है, तब तक उसका पूर्ण लाभ लेना चाहिए और बाद में उनकी शिक्षाओं को ही अपने जीवन का आधार बना लेना चाहिए। प्रेमानंद महाराज के अनुसार यही सच्ची गुरु सेवा है और यही साधक को जीवन की हर परिस्थिति में मार्ग दिखाती है।