भारत में पिछले एक दशक के दौरान जन्मदर में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। नवीनतम आंकड़ों के अनुसार देश की कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate) घटकर 1.9 पर आ गई है, जो प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से कम है। इसका अर्थ है कि अब औसतन महिलाएं उतने बच्चे पैदा नहीं कर रही हैं, जितने जनसंख्या को स्थिर बनाए रखने के लिए आवश्यक होते हैं।
इस गिरावट को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा तेज हो गई है। टेस्ला और स्पेसएक्स के सीईओ एलन मस्क ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर चिंता जताते हुए कहा कि भारत में जन्मदर लंबे समय से गिरावट की ओर है, खासकर शिक्षित वर्ग में यह दर काफी पहले ही रिप्लेसमेंट स्तर से नीचे चली गई थी। उन्होंने दिल्ली की प्रजनन दर 1.2 होने का उल्लेख किया, जो कई विकसित देशों से भी कम मानी जा रही है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) की 2025 रिपोर्ट के अनुसार भी भारत की प्रजनन दर 1.9 दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही कुल जनसंख्या फिलहाल बढ़ती रहे, लेकिन यह गिरावट भविष्य में बड़े जनसांख्यिकीय बदलाव का संकेत है।
विशेष रूप से दिल्ली, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में यह दर तेजी से घटी है, जिससे छोटे परिवारों की प्रवृत्ति बढ़ी है। यह स्थिति भारत को एक नए जनसांख्यिकीय चरण की ओर ले जा रही है, जहां युवा आबादी की तुलना में बुजुर्गों की संख्या बढ़ सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यही रुझान जारी रहा तो आने वाले दशकों में देश की कार्यबल क्षमता, आर्थिक विकास और सामाजिक संरचना पर इसका गहरा प्रभाव देखने को मिल सकता है। सरकार और नीति निर्माताओं के लिए यह एक महत्वपूर्ण चुनौती के रूप में उभर रहा है।









