भारत ने डिजिटल आत्मनिर्भरता की दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए अपने राष्ट्रीय टाइमिंग सिस्टम को मजबूत बनाने की शुरुआत कर दी है। सरकार ने देशभर में अत्याधुनिक व्हाइट रैबिट टेक्नोलॉजी लागू करने का फैसला किया है। इसका उद्देश्य बैंकिंग, शेयर बाजार, दूरसंचार, बिजली ग्रिड और रक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को विदेशी सैटेलाइट आधारित टाइमिंग सिस्टम पर निर्भरता से मुक्त करना है।
अब तक भारत समेत कई देश सटीक समय के लिए अमेरिका के जीपीएस, रूस के ग्लोनास और यूरोप के गैलीलियो जैसे सैटेलाइट सिस्टम पर निर्भर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी आपात स्थिति, युद्ध या साइबर हमले के दौरान इन सिग्नलों में बाधा आने या गलत समय मिलने से बैंकिंग लेनदेन, शेयर बाजार और बिजली आपूर्ति जैसी सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।
इसी चुनौती से निपटने के लिए भारत ने व्हाइट रैबिट टेक्नोलॉजी को अपनाया है। यह तकनीक एक नैनोसेकंड से भी कम समय की सटीकता प्रदान करती है, जो पारंपरिक जीपीएस आधारित टाइमिंग सिस्टम की तुलना में कहीं अधिक सटीक मानी जाती है। इस तकनीक का उपयोग स्विट्जरलैंड की प्रसिद्ध वैज्ञानिक संस्था CERN में भी किया जाता रहा है।
नई व्यवस्था के तहत दिल्ली स्थित सीएसआईआर-नेशनल फिजिकल लेबोरेटरी (NPL) में मौजूद परमाणु घड़ियों से देश का आधिकारिक समय निर्धारित होगा। इसके बाद बीएसएनएल के सुरक्षित ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क के जरिए यह समय देशभर के प्रमुख संस्थानों और प्रयोगशालाओं तक पहुंचाया जाएगा। चूंकि यह प्रणाली फाइबर नेटवर्क पर आधारित है, इसलिए सैटेलाइट सिग्नल जामिंग या स्पूफिंग जैसी चुनौतियों का खतरा काफी कम हो जाएगा। सरकार का मानना है कि यह पहल भारत की डिजिटल संप्रभुता को नई मजबूती देगी और भविष्य में वित्तीय, तकनीकी तथा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण ढांचे को अधिक सुरक्षित और आत्मनिर्भर बनाएगी।


