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परिसीमन और महिला आरक्षण विवाद: सीटों के नए गणित पर सत्ता-विपक्ष आमने-सामने

लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण को लेकर सबसे बड़ा विवाद परिसीमन (डिलिमिटेशन) विधेयक पर केंद्रित है। विपक्ष का कहना है कि यदि जनसंख्या के आधार पर परिसीमन हुआ तो उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों की लोकसभा सीटों में भारी वृद्धि होगी, जबकि दक्षिण भारत के राज्यों जैसे तमिलनाडु और केरल को नुकसान हो सकता है। हालांकि सरकार का दावा है कि किसी भी राज्य की राजनीतिक स्थिति कमजोर नहीं होगी और सभी राज्यों की सीटों में समान रूप से 50 प्रतिशत तक वृद्धि की जाएगी।

सरकारी सूत्रों के अनुसार लोकसभा सीटों की कुल संख्या बढ़ाकर लगभग 850 करने का प्रस्ताव है। इसमें से 815 सीटें राज्यों के लिए और 35 केंद्र शासित प्रदेशों के लिए निर्धारित की जा सकती हैं। इस बदलाव का उद्देश्य यह बताया जा रहा है कि किसी भी राज्य का मौजूदा अनुपात प्रभावित न हो और संतुलन बना रहे। दक्षिण भारतीय राज्यों के मुख्यमंत्री जैसे एम. के. स्टालिन, रेवंत रेड्डी और नवीन पटनायक ने आशंका जताई है कि नए परिसीमन से उनके राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो सकता है।

परिसीमन प्रक्रिया एक स्वतंत्र आयोग द्वारा की जाती है, जिसका गठन राष्ट्रपति करते हैं। इसमें सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश अध्यक्ष होते हैं और चुनाव आयोग के प्रतिनिधि भी शामिल होते हैं। आयोग जनसंख्या के आंकड़ों के आधार पर सीटों का निर्धारण करता है, भौगोलिक सीमाएं तय करता है और जनता से सुझाव भी लेता है। परिसीमन आयोग के निर्णय अंतिम होते हैं और उन्हें अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। भारत में लोकसभा सीटों की वर्तमान सीमा 1971 की जनगणना के आधार पर तय है, जिसे बाद में 2026 तक स्थिर रखा गया था। अब अगली जनगणना के बाद नए बदलाव संभव हैं।

सरकार का कहना है कि तमिलनाडु, केरल और अन्य दक्षिणी राज्यों को नुकसान नहीं होगा और सीटों में समान अनुपात में वृद्धि की जाएगी। उदाहरण के तौर पर तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर लगभग 59, केरल की 20 से 30 और आंध्र प्रदेश की 25 से 37 तक हो सकती हैं। इस पूरे मुद्दे ने महिला आरक्षण और परिसीमन को संसद में राजनीतिक बहस का बड़ा केंद्र बना दिया है, जहां सत्ता और विपक्ष दोनों अपने-अपने तर्कों के साथ आमने-सामने हैं।