सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में छात्राओं और कामकाजी महिलाओं के लिए मासिक धर्म अवकाश की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। यह याचिका शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी ने दायर की थी। सीजेआई डी. वाई. सूर्यकांत की पीठ ने कहा कि ऐसी याचिकाएं कभी-कभी महिलाओं को कमजोर या कमतर दिखाने का माहौल पैदा कर सकती हैं। उनका तर्क था कि अगर मासिक धर्म अवकाश अनिवार्य कर दिया गया तो नियोक्ता महिलाओं को जिम्मेदार या महत्वपूर्ण पद देने में हिचक सकते हैं, जिससे उनके करियर पर असर पड़ सकता है।
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने भी इस मुद्दे के आर्थिक और व्यावहारिक पहलुओं की ओर ध्यान दिलाया और पूछा कि क्या नियोक्ता इससे खुश होंगे। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि केरल, कर्नाटक और ओडिशा जैसे कुछ राज्यों और संस्थानों में मासिक धर्म अवकाश दिया जाता है और इसे पूरे देश में लागू किया जा सकता है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह नीतिगत मामला है और इस पर निर्णय करना सरकार का काम है। अदालत ने याचिकाकर्ता से कहा कि इस विषय में सरकार के पास जाएं। अदालत ने इसी आधार पर याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। याचिकाकर्ता का कहना था कि गर्भावस्था पर अवकाश तो मिलता है, लेकिन मासिक धर्म के लिए नहीं। कुछ राज्यों और कंपनियों ने महीने में दो दिन की छुट्टी का प्रावधान किया है, और यह याचिका सभी कामकाजी महिलाओं और छात्राओं के लिए समान नियम बनाने की मांग पर आधारित थी।









