चीन ने अमेरिका द्वारा प्रस्तावित ‘गाजा बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने से इनकार कर दिया है, जिससे इस विवादास्पद पहल को लेकर वैश्विक राजनीतिक दबाव और बढ़ गया है। इससे पहले फ्रांस और नार्वे ने भी अंतरराष्ट्रीय कानून का हवाला देते हुए इस बोर्ड में शामिल होने से मना कर दिया था। चीन के इस फैसले ने अमेरिका के लिए चुनौती और बढ़ा दी है।
चीन ने इस मामले पर कहा कि वह हमेशा बहुपक्षीय कूटनीति का समर्थन करता है और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था तथा कानून के आधार पर काम करता रहेगा। भारत ने इस मामले पर अभी तक कोई अधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। यह रणनीति भारतीय दृष्टिकोण से समझी जा सकती है क्योंकि अमेरिका का गाजा बोर्ड प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र के ढांचे के बाहर है। भारत ऐतिहासिक रूप से फिलिस्तीन के आत्मनिर्णय और दो-राज्य समाधान का समर्थन करता रहा है, जबकि हाल के वर्षों में इजरायल के साथ रणनीतिक संबंध मजबूत हुए हैं।
गाजा बोर्ड ऑफ पीस अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में बनाया गया है। इसमें ट्रंप, विदेश मंत्री मार्को रुबियो, पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर और जेरेड कुशनर जैसे सदस्य शामिल हैं। बोर्ड का उद्देश्य गाजा में संघर्ष खत्म करने के साथ-साथ विश्व के अन्य विवादों को सुलझाना है, और इसमें शामिल देशों को तीन वर्ष की स्थायी सदस्यता और 1 बिलियन डॉलर योगदान करना होगा।









