महिलाओं की सुरक्षा को लेकर देश में लगातार बहस होती रही है, लेकिन जमीनी हकीकत अब भी चिंताजनक बनी हुई है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर बेहद स्पष्ट और गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल कड़े कानून बना देना पर्याप्त नहीं है, जब तक समाज की सोच में बदलाव नहीं आता।
एक मामले की सुनवाई के दौरान, जिसमें एक व्यक्ति पर अपनी पत्नी की हत्या का आरोप था, अदालत ने दोषी की अपील को खारिज करते हुए निचली अदालतों के फैसले को बरकरार रखा। इस दौरान कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि पीड़िता के अंतिम बयान जैसे साक्ष्य न्याय दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
अदालत ने कहा कि भारत में महिलाओं की सुरक्षा के लिए कानूनी ढांचा मजबूत है, फिर भी अपराधों में कमी न आना यह दर्शाता है कि समस्या कहीं अधिक गहरी है। जड़ में मौजूद पितृसत्तात्मक मानसिकता और महिलाओं को बराबरी का दर्जा न देने की प्रवृत्ति ही हिंसा को बढ़ावा देती है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि संविधान महिलाओं को सम्मान और गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है, लेकिन व्यवहारिक जीवन में यह अधिकार अक्सर सीमित नजर आता है। घर, कार्यस्थल और सार्वजनिक स्थान—हर जगह महिलाओं को असुरक्षा का सामना करना पड़ता है।
समाधान के तौर पर अदालत ने केवल कानूनी उपायों पर निर्भर रहने के बजाय सामाजिक परिवर्तन की आवश्यकता पर जोर दिया। शिक्षा, जागरूकता और नई पीढ़ी में समानता के मूल्यों को बढ़ावा देकर ही वास्तविक बदलाव संभव है। कोर्ट का संदेश साफ है—जब तक सोच नहीं बदलेगी, तब तक हालात नहीं बदलेंगे।









