Religion

पवित्र जीवन के नियम: कैसे रखें शरीर, वाणी और मन को निर्मल – प्रेमानंद महाराज से जानें

वृंदावन के सुप्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज अपने सरल और आत्मा को छू लेने वाले उपदेशों के लिए जाने जाते हैं। हाल ही में उनका एक वीडियो सोशल मीडिया पर काफी चर्चा में रहा, जिसमें उन्होंने पवित्रता के वास्तविक अर्थ और जीवन में इसकी अनिवार्यता पर प्रकाश डाला।

भक्त के सवाल पर महाराज ने बताया कि पवित्रता केवल बाहरी स्वच्छता या धार्मिक दिखावे तक सीमित नहीं है। यह एक संपूर्ण जीवन पद्धति है, जो व्यक्ति को भीतर से बदल देती है। उन्होंने पवित्रता के तीन मुख्य स्तंभ बताए: शरीर, वाणी और मन। शरीर की पवित्रता के बारे में महाराज कहते हैं कि शारीरिक स्वच्छता आध्यात्मिक जीवन की पहली सीढ़ी है। नियमित स्नान, वस्त्र बदलना और हाथ-पैर धोना न केवल स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है, बल्कि मन को भी शुद्ध बनाए रखता है।

वाणी की पवित्रता भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। कटु, अपमानजनक या झूठे शब्द बोलना मन और आत्मा दोनों के लिए हानिकारक है। वाणी ऐसी होनी चाहिए, जो दूसरों को दुख न पहुंचाए और आंतरिक शांति बनाए रखे। मन की शुद्धि सबसे कठिन लेकिन आवश्यक है। नकारात्मक और विकारपूर्ण विचारों से मन को मुक्त रखना ही सच्ची साधना है। ब्रह्मचर्य और सात्त्विक भोजन के माध्यम से भी मानसिक और शारीरिक शुद्धता बनाई जा सकती है।

महाराज कहते हैं कि पवित्र जीवन जीने वाले व्यक्ति को नाम जप और भक्ति से आत्मिक आनंद मिलता है, जो परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करता। उनके अनुभव से पता चलता है कि संयम और अनुशासन के साथ जीने पर कठिनाइयां भी जीवन को प्रभावित नहीं कर सकतीं। सच्ची पवित्रता का अर्थ है तन, वाणी और मन को शुद्ध रखकर भगवान से जुड़ने का प्रयास करना—यही भक्ति और पवित्र जीवन की असली पहचान है।