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तेल संकट, कमजोर रुपया और निवेश में गिरावट से बढ़ा दबाव, भारत की अर्थव्यवस्था के लिए चेतावनी

भारत की अर्थव्यवस्था इस समय कई वैश्विक चुनौतियों से गुजर रही है, जिनका सीधा असर देश के भुगतान संतुलन (Balance of Payments) पर देखा जा रहा है। मुख्य आर्थिक सलाहकार V. Anantha Nageswaran ने चेतावनी दी है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव आने वाले समय में भारत की आर्थिक स्थिरता के लिए गंभीर परीक्षा साबित हो सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, देश पर एक साथ तीन बड़े आर्थिक दबाव बन रहे हैं। पहला, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल, सोना और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में तेजी से वृद्धि हुई है। भारत अपनी ऊर्जा और कई जरूरी वस्तुओं के लिए भारी मात्रा में आयात पर निर्भर है, इसलिए वैश्विक महंगाई का सीधा असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।

दूसरा दबाव विदेशी निवेश में गिरावट का है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भारतीय शेयर बाजार से पूंजी निकाल रहे हैं, जिससे डॉलर की मांग बढ़ रही है और रुपये पर दबाव और गहरा हो गया है। तीसरा कारण व्यापार असंतुलन है, जहां आयात तेजी से बढ़ रहा है लेकिन निर्यात अपेक्षाकृत धीमा है, जिससे व्यापार घाटा बढ़ रहा है।

भुगतान संतुलन का अर्थ होता है किसी देश का विदेशों के साथ होने वाले सभी वित्तीय लेन-देन का लेखा-जोखा। इसमें निर्यात, निवेश और प्रवासी आय से आने वाली विदेशी मुद्रा शामिल होती है, जबकि आयात, विदेश यात्रा और अन्य खर्चों से पैसा बाहर जाता है। जब बाहर जाने वाला धन अधिक हो जाता है, तो अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ जाता है।

पश्चिम एशिया में तनाव और तेल आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता ने हालात और गंभीर कर दिए हैं, क्योंकि भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल इसी क्षेत्र से आयात करता है। इससे पेट्रोल, डीजल, एलपीजी और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर असर पड़ सकता है। हालांकि सरकार का कहना है कि भारत की अर्थव्यवस्था अब पहले से अधिक मजबूत है। देश का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 701 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है, जो किसी भी बाहरी आर्थिक झटके से निपटने में सहायक हो सकता है।