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भारत, सऊदी अरब और यूएई करेंगे समुद्र के नीचे बिजली का आदान-प्रदान, ऊर्जा क्षेत्र में होगा ऐतिहासिक बदलाव

भारत अब सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के साथ मिलकर एक ऐतिहासिक ऊर्जा परियोजना शुरू करने जा रहा है। इस योजना के तहत अरब सागर के नीचे हाई-वोल्टेज डायरेक्ट करंट (HVDC) केबल बिछाई जाएगी, जिससे बिजली को लंबी दूरी तक न्यूनतम नुकसान के साथ भेजा जा सकेगा। यह कदम केवल बिजली आयात का माध्यम नहीं होगा, बल्कि भारत और खाड़ी देशों के बीच ‘दो-तरफा ऊर्जा आदान-प्रदान’ को भी संभव बनाएगा।

इस परियोजना की सबसे बड़ी खासियत समय का लाभ है। भारत और सऊदी अरब के बीच लगभग तीन घंटे का अंतर है। इसका मतलब यह है कि जब भारत में शाम होगी और घरेलू सौर ऊर्जा उत्पादन बंद हो जाएगा, उस समय सऊदी अरब से भारत को ताजगी भरी सौर ऊर्जा मिल सकेगी। वहीं, जब भारत में दिन होगा और हमारी ग्रिड में अतिरिक्त सौर ऊर्जा होगी, हम इसे खाड़ी देशों को भेज सकेंगे। इससे न केवल बिजली की कीमतों में स्थिरता आएगी, बल्कि ऊर्जा आपूर्ति भी आपातकालीन परिस्थितियों में भरोसेमंद बनी रहेगी।

यह परियोजना भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में नई दिशा खोल सकती है। साथ ही, यह सऊदी अरब और यूएई के ग्रीन एनर्जी लक्ष्यों—जैसे ‘विजन 2030’ और ‘नेट जीरो 2050’—में भी योगदान देगा। दोनों देशों के पास तकनीकी संसाधन और वित्तीय शक्ति है, जबकि भारत अपनी सौर और पवन ऊर्जा तकनीक तथा विशेषज्ञता के माध्यम से इस साझेदारी को मजबूत करेगा।

समुद्र के नीचे बिछी यह ‘बिजली की रेखा’ सिर्फ तार नहीं होगी, बल्कि यह वैश्विक ऊर्जा सहयोग और क्लीन एनर्जी की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगी। आने वाले समय में यह परियोजना न केवल भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करेगी, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े सीमा-पार ऊर्जा नेटवर्क के रूप में इतिहास रचेगी।