दुनिया भर के देशों के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल परमाणु कचरे (न्यूक्लियर वेस्ट) के सुरक्षित निस्तारण की दिशा में फिनलैंड ने ऐतिहासिक कदम उठाया है। फिनलैंड ने दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्र में ‘ओंकालो’ नामक दुनिया की पहली स्थायी अंडरग्राउंड न्यूक्लियर वेस्ट स्टोरेज सुविधा विकसित की है, जहां हजारों टन रेडियोधर्मी कचरे को जमीन से करीब 433 मीटर यानी 1400 फीट नीचे सुरक्षित रूप से दफनाया जाएगा। इस परियोजना का उद्देश्य परमाणु कचरे को ऐसे स्थान पर रखना है जहां भूकंप, बाढ़ या किसी बाहरी हमले का असर न हो और यह लाखों वर्षों तक सुरक्षित रह सके।
परमाणु रिएक्टरों में बिजली उत्पादन के बाद बचने वाला स्पेंट फ्यूल अत्यधिक रेडियोधर्मी होता है और हजारों वर्षों तक विकिरण फैलाने की क्षमता रखता है। इसी कारण वैज्ञानिक दशकों से इसके स्थायी समाधान की तलाश में थे। फिनलैंड ने वर्ष 2004 में इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर काम शुरू किया था, जिसमें वैज्ञानिकों, भूगर्भशास्त्रियों और इंजीनियरों की टीम ने लगभग दो दशक तक शोध और निर्माण कार्य किया।
ओंकालो सुविधा को करोड़ों वर्ष पुरानी मजबूत ग्रेनाइट चट्टानों के भीतर बनाया गया है। विशेषज्ञों का दावा है कि ये चट्टानें अगले 10 लाख वर्षों तक भी स्थिर रह सकती हैं। इस स्टोरेज सिस्टम में कई सुरक्षा परतें लगाई गई हैं ताकि एक बार परमाणु कचरा अंदर रखने के बाद वह किसी भी परिस्थिति में बाहर न निकल सके। यहां लगभग 6,500 टन न्यूक्लियर वेस्ट को सुरक्षित रखने की क्षमता होगी।
योजना के तहत अगले 100 वर्षों तक धीरे-धीरे परमाणु कचरा यहां जमा किया जाएगा और क्षमता पूरी होने के बाद इस पूरे परिसर को स्थायी रूप से सील कर दिया जाएगा। इसके बाद कम से कम एक लाख वर्षों तक इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की खुदाई या हस्तक्षेप की अनुमति नहीं होगी। वैज्ञानिक भविष्य की सभ्यताओं को इस स्थान के खतरे के बारे में चेतावनी देने के लिए ऐसे संकेत और संदेश विकसित करने पर भी काम कर रहे हैं, जिन्हें हजारों पीढ़ियों बाद भी समझा जा सके।
अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और रूस जैसे देशों के पास भी बड़ी मात्रा में परमाणु कचरा मौजूद है, लेकिन उसके स्थायी निस्तारण का प्रभावी समाधान अभी तक नहीं मिल पाया है। फिनलैंड की इस परियोजना को अंतिम नियामकीय मंजूरी मिलने के बाद यह दुनिया का पहला देश बन जाएगा जो न्यूक्लियर वेस्ट के स्थायी और सुरक्षित भंडारण का समाधान लागू करेगा। यह पहल भविष्य में अन्य देशों के लिए भी एक मॉडल साबित हो सकती है।









