नई दिल्ली: दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते वायु प्रदूषण और पटाखों के इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान धार्मिक भावनाओं से जुड़ा मुद्दा चर्चा में रहा। अदालत ने सवाल उठाया कि पटाखे जलाने का धर्म से आखिर क्या संबंध है? जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने यह सवाल करते हुए पटाखों के समर्थन में धार्मिक मान्यताओं का हवाला दिए जाने पर सवाल खड़े किए।
सुनवाई के दौरान मामले में अदालत की मदद कर रहीं एमिकस क्यूरी अपराजिता सिंह ने कहा कि पटाखे जलाने के पक्ष में अक्सर धार्मिक भावनाओं का तर्क दिया जाता है। उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि पटाखों से होने वाले प्रदूषण का असर बच्चों की सेहत पर भी पड़ता है। उन्होंने कहा कि यदि देवताओं को यह पता चले कि उनके नाम पर बच्चे बीमार हो रहे हैं और परेशानियों का सामना कर रहे हैं, तो उन्हें भी दुख होगा।
वहीं, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि अदालत का उद्देश्य किसी की धार्मिक भावनाओं को आहत करना नहीं है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि लोगों को इस विषय पर खुद विचार करना चाहिए और जागरूकता बढ़ाने के लिए जरूरी कदम उठाए जा सकते हैं। अदालत की टिप्पणी से स्पष्ट हुआ कि प्रदूषण की समस्या से निपटने के दौरान धार्मिक संवेदनशीलता का भी ध्यान रखना जरूरी है।
हर साल दोहराया जाता है पटाखों का विवाद
अपराजिता सिंह ने सुनवाई के दौरान कहा कि अगर लोग खुद अपनी जिम्मेदारी समझें और जागरूक होकर फैसला लें, तो यह सबसे बेहतर स्थिति होगी। हालांकि, उन्होंने अफसोस जताया कि पटाखों के इस्तेमाल को लेकर हर साल वही बहस सामने आती है। प्रदूषण और स्वास्थ्य पर इसके प्रभाव को लेकर चिंता जताए जाने के बावजूद इस मुद्दे का बार-बार उठना समस्या की गंभीरता को दर्शाता है। दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण लंबे समय से चिंता का विषय रहा है। ऐसे में पटाखों के इस्तेमाल को लेकर अदालत में हुई चर्चा ने पर्यावरण संरक्षण, जनस्वास्थ्य और धार्मिक भावनाओं के बीच संतुलन बनाने की जरूरत को फिर सामने ला दिया है।


