पश्चिम बंगाल में ओबीसी आरक्षण व्यवस्था को लेकर बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक बदलाव देखने को मिला है। राज्य सरकार ने मौजूदा ओबीसी सूची को रद्द करते हुए 2010 से पहले की पुरानी सूची को फिर से लागू करने का निर्णय लिया है। इस कदम के साथ ही आरक्षण प्रणाली में धर्म आधारित वर्गीकरण को समाप्त कर दिया गया है। अब राज्य में ओबीसी श्रेणी के तहत आने वाले समुदायों को सरकारी नौकरियों और अन्य सेवाओं में कुल 7 प्रतिशत आरक्षण का लाभ मिलेगा।
सरकारी सूत्रों के अनुसार, यह फैसला कलकत्ता उच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन में लिया गया है। अदालत ने 2010 से 2012 के बीच जोड़े गए कई समुदायों को ओबीसी दर्जा देने और जारी किए गए प्रमाणपत्रों को रद्द कर दिया था। इस फैसले के बाद लगभग 12 लाख ओबीसी प्रमाणपत्र प्रभावित हुए हैं।
राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि नई व्यवस्था सामाजिक न्याय और पारदर्शिता को ध्यान में रखकर लागू की जा रही है। इससे पहले ओबीसी आरक्षण को दो श्रेणियों में बांटा गया था—कैटेगरी A और कैटेगरी B, जिनमें क्रमशः 10 प्रतिशत और 7 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान था। अब इस विभाजन को भी समाप्त कर दिया गया है।
नई सूची में कई पारंपरिक और सामाजिक समुदाय शामिल हैं, जिनमें कपाली, कुर्मी, सूत्रधार, कर्मकार, स्वर्णकार, नाई, तांती, धानुक, कसाई, खंडैत, तुरहा, देवांग और ग्वाला जैसे वर्ग प्रमुख हैं। इसके अलावा तीन मुस्लिम समुदाय—पहाड़िया, हज्जाम और चौदुली—को भी पिछड़ा वर्ग में शामिल रखा गया है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है, और आगामी चुनावों से पहले इसे एक महत्वपूर्ण सामाजिक और राजनीतिक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।









