भारत की अध्यक्षता में आयोजित ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को लेकर सदस्य देशों के बीच गंभीर मतभेद देखने को मिले। ईरान, इजरायल और अमेरिका से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर अलग-अलग दृष्टिकोण के कारण इस बार बैठक में कोई साझा या संयुक्त बयान जारी नहीं किया जा सका। विभिन्न देशों की असहमति के चलते आम सहमति बनाना मुश्किल साबित हुआ।
सूत्रों के अनुसार, बैठक के दौरान ईरान ने यह मांग रखी कि इजरायल और अमेरिका द्वारा की गई कार्रवाइयों की स्पष्ट निंदा ब्रिक्स मंच से की जाए। हालांकि, इस प्रस्ताव पर सभी सदस्य देश एकमत नहीं हो सके। कुछ देशों ने कहा कि किसी एक पक्ष को सीधे तौर पर दोषी ठहराना कूटनीतिक संतुलन और ब्रिक्स की परंपरा के विपरीत होगा, जबकि कुछ अन्य देशों ने क्षेत्रीय तनाव को देखते हुए अधिक सख्त रुख अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
असहमति के कारण अंततः संयुक्त बयान जारी नहीं हो सका। इसके स्थान पर भारत की ओर से एक विस्तृत अध्यक्षीय बयान जारी किया गया, जिसमें कुल 63 बिंदुओं के माध्यम से सदस्य देशों के विभिन्न विचारों और सुझावों को शामिल किया गया। इस बयान में यह स्पष्ट किया गया कि पश्चिम एशिया की स्थिति पर देशों के मत अलग-अलग हैं, लेकिन सभी ने इस बात पर सहमति जताई कि समाधान केवल संवाद और कूटनीति के माध्यम से ही संभव है।
बयान में अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान पर विशेष जोर दिया गया। साथ ही, एकतरफा प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय नियमों के विपरीत उठाए गए दंडात्मक कदमों की आलोचना भी की गई। मानवीय संकटों से निपटने के लिए वैश्विक सहयोग को मजबूत करने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया।
फलस्तीन मुद्दे पर भी चर्चा हुई, जिसमें 1967 की सीमाओं के आधार पर स्वतंत्र राज्य के समर्थन को दोहराया गया। कुल मिलाकर, यह बैठक पश्चिम एशिया पर मतभेदों के कारण सीमित एकजुटता के साथ समाप्त हुई, हालांकि शांति और संवाद की आवश्यकता पर सभी देशों की सहमति बनी रही।









