सुप्रीम कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका में मुस्लिम महिलाओं को पुरुषों के बराबर संपत्ति में हिस्सेदारी देने की मांग उठाई गई। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि देश की सभी महिलाओं के लिए समान उत्तराधिकार अधिकार सुनिश्चित करने का एक तरीका यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) भी हो सकता है। न्यायाधीशों ने यह भी स्पष्ट किया कि यह नीतिगत और विधायी क्षेत्र का मुद्दा है, जिस पर अंतिम निर्णय संसद और सरकार को करना होगा।
याचिका में मुस्लिम पर्सनल लॉ के उन प्रावधानों को चुनौती दी गई है, जो महिलाओं को पुरुषों के बराबर विरासत अधिकार नहीं देते। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने वकील प्रशांत भूषण से पूछा कि क्या अदालत पर्सनल लॉ की संवैधानिक वैधता पर विचार कर सकती है। बेंच ने यह भी चिंता जताई कि अगर उत्तराधिकार के शरीयत नियम रद्द हो जाएँ तो कानूनी शून्य न पैदा हो जाए।
प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि यदि शरीयत के प्रावधान हटते हैं तो भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 लागू किया जा सकता है और मुस्लिम महिलाओं को भी पुरुषों के बराबर अधिकार मिल सकते हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के ट्रिपल तलाक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि विरासत अधिकार सिविल राइट है, इसे धार्मिक स्वतंत्रता के तहत “आवश्यक धार्मिक प्रथा” नहीं माना जा सकता। अदालत ने याचिका में स्पष्ट करने को कहा कि यदि शरीयत प्रावधान हटाए जाते हैं तो वैकल्पिक कानूनी व्यवस्था क्या होगी। इसके बाद याचिका संशोधित करने की अनुमति दी गई और सुनवाई स्थगित कर दी गई।









