Rajasthan

अरावली की 100 मीटर कसौटी पर बवाल, संरक्षण पर खतरा, विधायक भाटी ने PM को भेजा पत्र

भारत की सबसे पुरानी पर्वतमालाओं में शामिल अरावली इन दिनों गंभीर पर्यावरणीय और राजनीतिक बहस का केंद्र बन गई है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहाड़ी की नई परिभाषा को लेकर राजस्थान में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। नई व्याख्या के अनुसार केवल वही भू-भाग अरावली माना जाएगा जो आसपास की सतह से कम से कम 100 मीटर ऊंचा हो। इस मानक के सामने आते ही विशेषज्ञों और जनप्रतिनिधियों ने चेतावनी दी है कि इससे अरावली की अधिकांश पहाड़ियां कानूनी संरक्षण से बाहर हो सकती हैं।

पर्यावरणविदों का कहना है कि अरावली की भौगोलिक संरचना प्राकृतिक रूप से बहुत कम ऊंचाई वाली और फैली हुई है। ऐसे में केवल ऊंचाई के आधार पर उसकी पहचान करना वैज्ञानिक दृष्टि से गलत है। आंकड़ों के अनुसार राजस्थान में मौजूद 12 हजार से अधिक अरावली पहाड़ियों में से मात्र करीब एक हजार ही 100 मीटर से ज्यादा ऊंची हैं। इसका सीधा अर्थ है कि लगभग 90 प्रतिशत पहाड़ियां संरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएंगी।

इस फैसले के बाद राज्य की राजनीति भी गर्मा गई है। निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इसे पर्यावरण के लिए खतरनाक बताते हुए हस्तक्षेप की मांग की है। उनका आरोप है कि यह कदम खनन माफियाओं और रियल एस्टेट लॉबी को फायदा पहुंचाने वाला है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी इस मुद्दे को समर्थन देते हुए इसे जन आंदोलन का रूप देने की बात कही है।

विशेषज्ञों की चिंता है कि यदि अरावली कमजोर पड़ी तो इसका असर पूरे उत्तर-पश्चिम भारत पर पड़ेगा। यह पर्वतमाला मानसून की दिशा, तापमान संतुलन और मरुस्थलीकरण को रोकने में अहम भूमिका निभाती है। अरावली का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा राजस्थान में फैला है, इसलिए इसके नुकसान का सबसे बड़ा असर राज्य पर ही पड़ेगा। बढ़ता अवैध खनन, जल संकट और जलवायु असंतुलन आने वाले समय में बड़ी चुनौती बन सकते हैं।