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World Epilepsy Day : दवाओं और सर्जरी से 70% मिर्गी मरीज हो सकते हैं नियंत्रित

आज वर्ल्ड एपिलेप्सी डे के मौके पर विशेषज्ञों ने मिर्गी को लेकर समाज में फैली गलत धारणाओं और अंधविश्वासों पर चिंता जताई है। डॉक्टरों का कहना है कि बीमारी के बारे में जागरूकता की कमी और भूत-प्रेत जैसी भ्रांतियों के कारण बड़ी संख्या में मरीज समय पर इलाज नहीं करा पाते, जिससे स्थिति गंभीर हो जाती है।

मिर्गी एक गंभीर लेकिन इलाज योग्य न्यूरोलॉजिकल बीमारी है, जिसमें मरीज को बार-बार दौरे पड़ते हैं। भारत में करीब 1.5 करोड़ से अधिक लोग इससे प्रभावित हैं। हालांकि, छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में डर, सामाजिक कलंक और गलतफहमियों की वजह से मरीज डॉक्टर तक पहुंचने में देरी कर देते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, मिर्गी के सभी दौरे झटकों के रूप में नहीं आते। कई बार मरीज को खालीपन, भ्रम, अचानक ध्यान भटकना या कुछ सेकंड की बेहोशी जैसे हल्के लक्षण दिखते हैं, जिन्हें लोग सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। यही वजह है कि बीमारी की पहचान देर से हो पाती है।

मिर्गी का दौरा दिमाग के इलेक्ट्रिकल सिग्नल्स में गड़बड़ी के कारण पड़ता है। समाज में फैली भ्रांतियां—जैसे इसे छूने से फैलना या मुंह में कुछ डालना—मरीज के लिए खतरनाक साबित हो सकती हैं। डॉक्टरों का कहना है कि नियमित दवाओं और सही इलाज से करीब 70% मरीज अपने दौरों को नियंत्रित कर सकते हैं और सामान्य जीवन जी सकते हैं। वहीं, जिन मरीजों पर दवाएं असर नहीं करतीं, उनके लिए अब एडवांस सर्जरी और न्यूरो-रोबोटिक तकनीक जैसे आधुनिक विकल्प उपलब्ध हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, सही मरीजों में सर्जरी से दौरे पूरी तरह खत्म भी हो सकते हैं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने अपील की है कि मिर्गी को अंधविश्वास से नहीं, बल्कि मेडिकल समस्या के रूप में समझें और समय पर इलाज कराएं, ताकि मरीज सामान्य और सुरक्षित जीवन जी सकें।

Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. न्यूज़ फ्लिक्स भारत इसकी पुष्टि नहीं करता है.