कई बार लोग पूरी निष्ठा से भगवान की भक्ति में लीन रहते हैं, उपवास रखते हैं और सत्संग में भाग लेते हैं, फिर भी जीवन में कठिनाइयों और दुखों का सामना करना पड़ता है। यह सवाल अक्सर उठता है – इतनी भक्ति के बावजूद दुख क्यों मिलता है? संत प्रेमानंद महाराज ने इस पर बहुत सरल और स्पष्ट दृष्टिकोण साझा किया है।
महाराज के अनुसार, जीवन में आने वाले दुख और परेशानियां भगवान की देन नहीं, बल्कि हमारे पिछले कर्मों का फल होते हैं। इन्हें ‘प्रारब्ध’ कहा जाता है। भगवान हमें यह दुख इसलिए देते हैं कि वे हमारे पापों और गलतियों को शुद्ध कर हमें आध्यात्मिक रूप से मजबूत बनाना चाहते हैं। जैसे गंदे कपड़े को साफ करने के लिए रगड़ना पड़ता है, वैसे ही दुख हमारी आत्मा को पवित्र करता है।
जब लोग पूछते हैं, “इतनी भक्ति करने के बावजूद तुम्हें दुख क्यों मिल रहा है? तुम्हारा भगवान कहाँ है?”, तो प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि एक सच्चा भक्त कहता है, “मेरा भगवान मेरे साथ है। तभी मैं इतने बड़े दुख को भी धैर्य और हृदय की शांति के साथ सह पा रहा हूँ।” भक्ति दुखों को मिटाने का साधन नहीं, बल्कि उन्हें सहने की शक्ति और समझ देने का माध्यम है।
महाराज खुद इसका उदाहरण देते हैं – उनकी दोनों किडनियां फेल हैं, लेकिन वे इसे दुख नहीं बल्कि भगवान का आशीर्वाद मानते हैं। इसी कष्ट ने उन्हें भजन, सेवा और प्रवचन के मार्ग पर अडिग रखा।उन्होंने यह भी याद दिलाया कि महान संत और पांडवों को भी दुख का सामना करना पड़ा। श्रीरामकृष्ण परमहंस को कैंसर हुआ, पांडवों को वनवास और अपनों का दुख सहना पड़ा। सच्ची भक्ति वही है जो सुख और दुख में समान भाव बनाए रखे और हर कठिनाई में भगवान की उपस्थिति महसूस करे।









