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जानिए क्यों डिजिटल इंडिया के बावजूद केंद्रीय विद्यालय तवांग और लेह में अभी भी होती है ब्लैकबोर्ड से पढ़ाई

डिजिटल इंडिया के दौर में अधिकांश स्कूल ऑनलाइन क्लासेस और स्मार्ट एजुकेशन की ओर बढ़ रहे हैं। लेकिन भारत के कुछ केंद्रीय विद्यालय ऐसे भी हैं, जहां इंटरनेट और डिजिटल टेक्नोलॉजी की पहुंच अब भी बेहद सीमित है। तवांग (अरुणाचल प्रदेश) और लेह जैसे दुर्गम क्षेत्रों के स्कूलों में पढ़ाई पूरी तरह ऑफलाइन मोड पर निर्भर है।

इन स्कूलों में शिक्षक ब्लैकबोर्ड और किताबों का इस्तेमाल करके पढ़ाते हैं। इंटरनेट न होने की वजह से ऑनलाइन नोट्स, वीडियो लेक्चर या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग जैसी सुविधाएं अभी भी सपना ही हैं। प्रशासनिक कार्य जैसे सैलरी स्लिप, ट्रांसफर आवेदन और बोर्ड से जुड़े दस्तावेज भेजने के लिए शिक्षक कई किलोमीटर पैदल चलकर या कठिन रास्तों से ब्लॉक कार्यालय तक जाते हैं।

तवांग और लेह जैसे दूरस्थ केंद्रीय विद्यालय में शिक्षक लंबी अवधि तक अपने परिवार से दूर रहते हैं। बर्फीला मौसम, बिजली की अनियमितता, पीने के पानी की कमी और स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित सुविधा उनके रोजमर्रा के जीवन को चुनौतीपूर्ण बनाती हैं। मनोरंजन और सामाजिक गतिविधियों के अवसर भी बेहद कम हैं।

फिर भी, शिक्षक बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने में पीछे नहीं हटते। वे स्थानीय सामग्री से हैंडमेड मॉडल और चार्ट बनाकर विज्ञान और गणित के कॉन्सेप्ट समझाते हैं। कभी-कभी स्थानीय प्रशासन और सेना की मदद से छात्रों को बेसिक तकनीकी जानकारी भी उपलब्ध कराई जाती है।

केंद्रीय विद्यालय तवांग और लेह के शिक्षक साबित करते हैं कि शिक्षा के प्रति जुनून किसी भौगोलिक या डिजिटल बाधा से मजबूत होता है। सीमित संसाधनों के बावजूद उनका समर्पण दिखाता है कि कठिनाइयों के बीच भी ज्ञान की ज्योति जलाना संभव है।