संत प्रेमानंद महाराज के अनुसार, तांबे के पात्र में रखा जल साधारण पानी नहीं है, बल्कि यह शरीर, मन और आत्मा के लिए बेहद लाभकारी होता है। आयुर्वेद और विज्ञान दोनों इसे औषधि के समान मानते हैं।
तांबे के सूक्ष्म तत्व शरीर से विषैले तत्वों को निकालने, पाचन क्रिया को संतुलित करने और प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करते हैं। प्रेमानंद महाराज बताते हैं कि जब जल को रातभर तांबे के पात्र में रखा जाता है, तो यह धातु अपनी सकारात्मक ऊर्जा जल में स्थानांतरित कर देती है। सुबह इस जल का सेवन करने से शरीर में नई ऊर्जा का संचार होता है, पेट की समस्याओं में राहत मिलती है और बौद्धिक शक्तियों का विकास होता है।
हिंदू धर्म में जल को देवत्व का प्रतीक माना गया है, और जब इसे तांबे के पात्र में रखा जाता है, तो “जल” और “पृथ्वी” तत्व का दिव्य संगम बनता है। प्रेमानंद महाराज के अनुसार, इसे पीना साधना के समान है और यह शरीर के साथ-साथ आत्मा को भी शांति और ताजगी देता है।









