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भारत की दवा नीति पर अमेरिका का दबाव अनुचित, घरेलू उद्योगों की सुरक्षा जरूरी: संजय शर्मा

हिमाचल ड्रग्स मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन (HDMA) के वित्त सचिव और प्रदेश प्रवक्ता संजय शर्मा ने कहा है कि भारत की फार्मास्युटिकल इंडस्ट्री लंबे समय से देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही है, लेकिन हाल के दिनों में अमेरिका द्वारा बढ़ाए जा रहे दबाव से यह क्षेत्र संकट में है. उनका कहना है कि भारत को अपनी दवा नीति में किसी भी विदेशी दबाव के आगे नहीं झुकना चाहिए.

संजय शर्मा ने बताया कि घरेलू दवा निर्माण के लिए भारत में पहले से ही “शेड्यूल एम” जैसे कड़े मानक लागू हैं, जो गुणवत्ता और सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं. वहीं, निर्यात के लिए कंपनियों को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), अमेरिकी एफडीए और ब्रिटेन की एमएचआरए जैसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के नियमों का पालन करना पड़ता है. ऐसे में अमेरिका का भारत की घरेलू नीति में दखल देना अनुचित है.

उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिकी एजेंसियों की निगरानी केवल उन दवाओं तक सीमित रहनी चाहिए जो अमेरिकी बाजार के लिए बनाई जाती हैं. भारत की सूक्ष्म, लघु और मध्यम (MSME) दवा इकाइयां न केवल करोड़ों लोगों को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराती हैं, बल्कि लाखों परिवारों को रोजगार भी देती हैं. विदेशी मानकों के कठोर अनुपालन से इन इकाइयों पर भारी बोझ पड़ेगा, जिससे कई छोटे उद्योग बंद होने की कगार पर पहुंच सकते हैं.

वर्तमान में देश के करीब 10,500 फार्मा उद्योगों में से केवल 1,700 इकाइयों ने ही नए मानकों को अपनाने में रुचि दिखाई है. शर्मा का कहना है कि भारत को अपनी दवा नीति अपनी सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप बनानी चाहिए, ताकि आत्मनिर्भरता और रोजगार दोनों सुरक्षित रह सकें.