कर्नाटक के हसन जिले में स्थित हसनंबा मंदिर अपनी अनूठी परंपराओं और चमत्कारों के लिए जाना जाता है। यह मंदिर 12वीं शताब्दी में होयसला शैली में बना, और इसकी मुख्य देवी आदि शक्ति हैं। खास बात यह है कि यह मंदिर साल में केवल एक दिन, दिवाली के दिन, भक्तों के लिए खुलता है। इस दिन श्रद्धालुओं का तांता लगता है।
मंदिर के परिसर में रावण की दस सिरों वाली वीणा बजाती मूर्ति और शिव का अद्वितीय रूप – अर्जुन को पशुपदास्त्र देते हुए – देखा जा सकता है। जब मंदिर खुलता है, तो दो बोरी चावल, पानी और एक घी का दीपक (नंदा दीपम) रखा जाता है, जिसे फूलों से सजाया जाता है। चमत्कार यह है कि यह चावल पूरे साल सुरक्षित रहता है और दीपक लगातार जलता रहता है।
हसनंबा का अर्थ है मुस्कुराती माता, जो भक्तों को वरदान देती हैं और कष्ट पहुँचाने वालों को सजा देती हैं। मंदिर की कहानी में एक भक्त को पत्थर में बदलकर मंदिर में रखा गया, जो ‘शोशी कल’ कहलाता है। चावल के दाने के रूप में यह पत्थर हर साल देवी की ओर बढ़ता है और कहा जाता है कि यह कलियुग के अंत तक हसनंबा तक पहुँचेगा। यह मंदिर इसलिए न केवल धार्मिक बल्कि चमत्कारिक दृष्टि से भी विशेष माना जाता है।
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