सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि विदेशी कोर्ट द्वारा दिया गया तलाक हमेशा भारत में मान्य नहीं होगा। विशेषकर उन मामलों में जो हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत आते हैं। कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के एक निर्णय को रद्द करते हुए कहा कि विदेशी अदालत द्वारा दिया गया तलाक, यदि भारतीय कानून की आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता, तो वह भारत में बाध्यकारी नहीं होगा।
मामला एक जोड़े से जुड़ा था, जिनकी शादी 25 दिसंबर, 2005 को मुंबई में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुई थी। इसके बाद दंपति अमेरिका चले गए, लेकिन उनके रिश्ते में खटास आने लगी और 2008 तक वे अलग रहने लगे। पत्नी ने मिशिगन, अमेरिका की अदालत में तलाक के लिए अर्जी दी, जबकि पति ने दावा किया कि अमेरिकी कोर्ट के पास इस मामले पर अधिकार क्षेत्र नहीं है।
अमेरिकी अदालत ने 13 फरवरी, 2009 को “शादी का ऐसा टूटना जिसे ठीक न किया जा सके” के आधार पर तलाक दे दिया। इसके बाद, पति ने पुणे फैमिली कोर्ट में भारत में तलाक की अर्जी दाखिल की। पुणे कोर्ट ने अमेरिकी फैसले को भारतीय कानून के तहत मान्य नहीं ठहराया, लेकिन बॉम्बे हाई कोर्ट ने इसे पलट दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों और तथ्यों की गहन समीक्षा के बाद दो अहम निर्णय दिए। पहला, विदेशी तलाक का आदेश भारत में वैध नहीं है यदि यह भारतीय कानून, विशेषकर हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप न हो। दूसरा, कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए इस जोड़े को अंतिम तलाक प्रदान किया, यह देखते हुए कि वे लगभग 18 साल से अलग रह रहे थे।
इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि भारत में विदेशी तलाक मान्यता प्राप्त करने के लिए भारतीय वैवाहिक कानून और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना अनिवार्य है। यह निर्णय विदेशी तलाक के मामलों में कानून की दिशा को मजबूत करता है और समान कानूनी विवादों में मिसाल बन सकता है।









