सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कर्मचारी हितों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि कामकाजी दुर्घटनाओं के मुआवजे में देरी होने पर लगने वाला जुर्माना नियोक्ता को अपनी जेब से देना होगा। अदालत ने कहा कि यह नियम कर्मचारियों की सुरक्षा और उनके परिवारों की आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बनाया गया है, इसलिए इसकी व्याख्या भी कर्मचारियों के पक्ष में की जानी चाहिए।
यह मामला एक ऐसे कर्मचारी से जुड़ा था, जिसकी 2017 में अपने नियोक्ता के वाहन को चलाते समय मृत्यु हो गई थी। पीड़ित परिवार ने मुआवजे के लिए श्रम विभाग से संपर्क किया था, जिसके बाद करीब 7.36 लाख रुपये का मुआवजा, 12 प्रतिशत ब्याज और 35 प्रतिशत अतिरिक्त जुर्माना लगाया गया। हालांकि वाहन का बीमा होने के कारण मुआवजे की राशि बीमा कंपनी से वसूली जानी थी, लेकिन जुर्माने की जिम्मेदारी नियोक्ता पर डाली गई।
दिल्ली हाई कोर्ट ने पहले अपने फैसले में जुर्माने की राशि बीमा कंपनी पर डाल दी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे पलटते हुए कहा कि कानून में किए गए संशोधनों के अनुसार जुर्माना मुआवजे और ब्याज से अलग है। अदालत ने यह भी कहा कि यदि जुर्माना भी बीमा से ही वसूला जाएगा, तो नियोक्ता समय पर भुगतान करने को गंभीरता से नहीं लेंगे, जिससे पीड़ित परिवारों को नुकसान होगा।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से यह संदेश गया है कि कार्यस्थल पर दुर्घटना होने की स्थिति में कंपनियों पर समय पर मुआवजा देने का दबाव रहेगा। इससे श्रमिकों और उनके परिजनों को वित्तीय सहायता जल्द मिलने की उम्मीद बढ़ेगी और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होगी।









