पश्चिम बंगाल की सियासत इस समय तीव्र ध्रुवीकरण की ओर बढ़ रही है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ईद के मौके पर नमाज में शामिल होकर अल्पसंख्यक मतदाताओं को संदेश दिया कि टीएमसी उनकी हितैषी है। अपने भाषण में उन्होंने मतदाता अधिकारों की रक्षा और चुनाव आयोग पर सवाल उठाते हुए सीधे भाजपा और केंद्र सरकार को निशाने पर लिया। यह कदम केवल धार्मिक समारोह नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति का हिस्सा था, जिसमें ममता खुद को लोकतंत्र की रक्षक के रूप में प्रस्तुत कर रही हैं।
वहीं, भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी ने कालीघाट मंदिर में पूजा अर्चना कर बहुसंख्यक हिंदू मतदाताओं को संदेश दिया। मां काली से आशीर्वाद लेने की यह तस्वीर राजनीतिक रूप से संकेत है कि भाजपा बंगाल की सांस्कृतिक पहचान को चुनाव में केंद्र में रखेगी और सत्ता परिवर्तन का दावा करेगी।
इन दोनों घटनाओं का समय और रूप बेहद रणनीतिक है। एक तरफ अल्पसंख्यक समुदाय को साधने की कोशिश, तो दूसरी तरफ बहुसंख्यक पहचान को मजबूत करना। अब बंगाल चुनाव केवल विकास या योजनाओं तक सीमित नहीं रहा; यह पहचान, प्रतीक और भावनाओं की लड़ाई बन गया है। हर मंच, हर तस्वीर और हर बयान राजनीतिक संदेश में तब्दील हो रहा है। आने वाले दिनों में बयानबाजी और टकराव और तेज होंगे, जिससे चुनावी राजनीति पहले से ज्यादा आक्रामक और ध्रुवीकृत दिखेगी।









