देश की छोटी और मध्यम दवा निर्माण इकाइयाँ (फार्मा एमएसएमई) गंभीर संकट का सामना कर रही हैं. केंद्र सरकार की सख्त नीतियों और औषधि नियंत्रण संस्था CDSCO की हालिया कार्रवाइयों ने इन्हें बंद होने की कगार पर पहुँचा दिया है. इसी को लेकर फार्मा एमएसएमई के ज्वाइंट फोरम ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा को ज्ञापन भेजकर तुरंत राहत देने की माँग की है. फोरम ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने समय रहते कदम नहीं उठाए, तो 4 से 5 हजार इकाइयाँ बंद हो सकती हैं. इससे सस्ती दवाओं की आपूर्ति बाधित होगी और भारत की “दुनिया की फार्मेसी” की पहचान भी खतरे में पड़ सकती है.
सबसे बड़ी समस्या नए रीवाइज्ड शेड्यूल-एम मानकों को लेकर है, जो 1 जनवरी 2026 से लागू होंगे. इनका पालन करने के लिए भारी निवेश की जरूरत है, जो छोटे उद्योग नहीं कर सकते. फोरम ने छोटे उद्योगों को 1 अप्रैल 2027 तक छूट देने की माँग की है. इसके अलावा, बायो-इक्विवेलेंस स्टडी जैसे नियम, जिनकी लागत 25–50 लाख प्रति दवा है, छोटे उद्योगों के लिए असंभव हैं. वहीं, निर्यात की मंजूरी और “न्यू ड्रग” नियमों को लेकर भी चिंता जताई गई है.
देशभर की 21 से ज्यादा फार्मा एसोसिएशन एक मंच पर आकर सरकार से सहयोग की माँग कर रही हैं. हिमाचल दवा निर्माता संघ ने चेताया है कि यदि समय रहते समाधान नहीं निकाला गया, तो दो दिन का राष्ट्रव्यापी उत्पादन बंद किया जाएगा. सरकार को चाहिए कि वह छोटे उद्योगों को बचाने के लिए स्पष्ट नीति और सहयोग दे, ताकि देश में सस्ती और अच्छी दवाओं की उपलब्धता बनी रहे.









