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महंगाई 14 साल के निचले स्तर पर, ‘कम कीमतों’ का फायदा बाजार में क्यों नहीं दिख रहा?

लंबे समय तक महंगाई भारतीयों की सबसे बड़ी चिंताओं में रही है, लेकिन फिलहाल तस्वीर उलट गई है। खुदरा महंगाई और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) दोनों ऐतिहासिक रूप से नीचे आ गए हैं। रिजर्व बैंक जहां महंगाई को 4% के आसपास रखने का लक्ष्य रखता है, वहीं वर्तमान दर बीते 14 वर्षों में सबसे कम स्तर पर है। जनवरी में खुदरा महंगाई 4.3% थी, जो घटकर केवल 0.25% रह गई है, जबकि थोक महंगाई -1.21% पर है।

हालांकि कागज़ी आंकड़ों में गिरावट दिखती है, पर बाजार में इसका असर नजर नहीं आता। इसकी मुख्य वजह “बेस इफेक्ट” है—जहां तुलना पिछले वर्ष के ऊंचे दामों से की जाती है, जिससे वर्तमान वृद्धि कम दिखाई देती है। खाद्य पदार्थों के दामों में तेज गिरावट ने CPI को नीचे खींचा है, लेकिन कोर महंगाई, जिसमें भोजन और ऊर्जा शामिल नहीं होते, अभी भी 4.4% बनी हुई है। यही वजह है कि किराया, स्कूल फीस, दवाइयाँ और सेवाओं की कीमतें लोगों को महंगी लग रही हैं।

सोना-चांदी के तेज दाम भी कोर महंगाई पर प्रभाव डाल रहे हैं। महंगाई का बहुत कम होना भी चिंता का कारण है, क्योंकि यह मांग में कमी और आर्थिक सुस्ती की ओर इशारा करता है। जापान और यूरोप के अनुभव बताते हैं कि अत्यधिक कम महंगाई अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक नुकसान पहुंचा सकती है। इसलिए चुनौती यह है कि महंगाई संतुलन में रहे और विकास की रफ्तार भी कायम रहे।