भारत ने चीन पर निर्भरता कम करने के लिए नए दुर्लभ पृथ्वी तत्वों (Rare Earth Elements) के स्रोतों की खोज शुरू कर दी है।
अंदरूनी राज्यों जैसे अरुणाचल प्रदेश और मध्य प्रदेश में अब देश इन मिनरल्स के महत्वपूर्ण जमाव की जांच कर रहा है। खासकर अरुणाचल प्रदेश के पापम पारे जिले में नियोडिमियम की उच्च मात्रा पाई गई है, जो इलेक्ट्रिक वाहनों और एडवांस इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए बेहद जरूरी है।
इसके अलावा, असम के कार्बी आंगलॉंग और मेघालय के संग वैली क्षेत्र में भी REE युक्त मिट्टी मिली है। मध्य प्रदेश के सिंगरौली कोयला खदानों में भी इन तत्वों के संभावित भंडार पाए गए हैं। ये खोजें दिखाती हैं कि ये धातुएं केवल समुद्र तट या अलुवियल क्षेत्रों में नहीं बल्कि जंगल, पहाड़ और कोयला खानों में भी मौजूद हैं।
हालांकि, भारत अभी भी दुर्लभ पृथ्वी चुम्बकों के लिए चीन पर भारी निर्भर है। भारत में अधिकांश इम्पोर्ट वॉल्यूम और वैल्यू का 85-90 प्रतिशत चीन से आता है।
दुर्लभ पृथ्वी तत्वों में नियोडिमियम और प्रैसियोडिमियम जैसे लाइट REEs इलेक्ट्रिक मोटर्स और पवन टरबाइन के लिए जरूरी हैं, जबकि हेवी REEs जैसे डिस्प्रोसियम और टर्बियम हाई-परफॉर्मेंस एप्लीकेशन्स जैसे लड़ाकू विमान के लिए उपयोगी हैं।
वित्तीय वर्ष 2024-25 में भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने 195 एक्सप्लोरेशन प्रोजेक्ट्स के जरिए इन मिनरल्स का आंकलन किया। विशेषज्ञों का कहना है कि चीन की वैश्विक पकड़ के बीच भारत को अपने सप्लाई चैन को मजबूत और विविध बनाने की जरूरत है।
भारतीय ऑटोमेकर्स ने भी अपनी रणनीति तय कर ली है। टीवीएस मोटर और आथर एनर्जी जैसी कंपनियां गैर-चीनी स्रोतों से सामग्री जुटाने की तैयारी में हैं, जबकि बजाज ऑटो ने फिलहाल उत्पादन रोक दिया है।
इन खोजों और उपायों के जरिए भारत दुर्लभ पृथ्वी तत्वों में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है।









